कुर्बानी और बलिदान का जज्बा इंसानियत के हर पहलू को पाक साफ और अाध्यात्मिक रूप से ऐसा पाकीजा बना देता है कि वह अल्लाह व रसूल की रजा हासिल करने में विलीन होकर मानवता की सेवा का प्रतीक बन जाता है़ अल्लाह तआला यही चाहता है कि इंसान हर व्यक्ति के दुख दर्द की दवा बन जाये़
अल्लाह ने इंसान और जिन्नात को इबादत के लिए पैदा किया, अर्थात मोहताज, यतीम, बेसहारा, बेवा, गरीब और मानव की सेवा ही इबादत है़ नमाजे ईद उल अजहा के बाद हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत पर अमल करते हुए अल्लाह व रसूल की रजा हासिल करने और गरीबों की मदद करने की खातिर कुर्बानी करना इबादत है़ कुर्बानी इंसान को इंसानियत सिखाती है़
कुर्बानी उस व्यक्ति पर वाजिब है, जो मालिके नेसाब यानी हैसियत वाला हो़ यह जरूरी है कि वह कुर्बानी का तबर्रुक गरीबों और जरूरतमंदों में तकसीम कर दे, ताकि वह गरीब सपरिवार तीन दिन का भोजन सुखी होकर प्राप्त कर सके़
– मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी, (लेखक एदार-ए-शरिया, झारखंड के नाजिमे आला हैं)
