रांची : चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि, कानपुर की अतिथि साइंटिस्ट (कीट विज्ञान) डॉ नीरजा अग्रवाल ने कहा है कि झारखंड राज्य में फूलगोभी, बंधा गोभी, मूली आदि की खेती सालों भर की जाती है. इन सब्जियों की खेती में किसानों को खरपतवार से 33 प्रतिशत, कीट से 30 प्रतिशत तथा रोग से 26 प्रतिशत तक फसल का नुकसान उठाना पड़ता है. ज्यादातर किसानों को इन सब्जियों में पाये जाने वाले शत्रु कीट व मित्र कीट की जानकारी नहीं है. खेतों में कीटनाशक का अत्यधिक उपयोग मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है. इन समस्या का समाधान एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन तकनीक से किया जा सकता है.
डॉ अग्रवाल बुधवार को बिरसा कृषि विवि के कृषि संकाय में गोभी वर्गीय सब्जियों में कीट एवं रोग तथा उनका एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन विषय पर व्याख्यान दे रही थीं. डॉ अग्रवाल ने कहा कि गोभी में पतंगा, लाही, फलवेदक एवं पत्ती लपेटक कीटों का प्रकोप पाया जाता है. इससे बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी फसल प्रभेदों का प्रयोग और नियंत्रण के लिए जैविक कीटनाशी में बायोलैप, डेलिफन और हाल्ट का प्रयोग फायदेमंद है.
उन्होंने बताया कि इन फसलों में पौध नर्सरी से भी कीट पल कर बड़े होते हैं और इसके लिए पौधशाला में बुआई के आठ से दस दिन पहले फेप्रोनिल का स्प्रे करना चाहिए.मौके पर अनुसंधान निदेशक डॉ डीएन सिंह, डॉ देवेंद्र प्रसाद, डॉ पीके सिंह, डॉ रवींद्र प्रसाद, डॉ राघव ठाकुर, डॉ जीएस दुबे, डॉ केके झा, डॉ कुमुद सिंह, डॉ डीके शाही आदि थे.
