रांची : देश में हिंदी का विकास केवल हिंदी दिवस तक सिमट कर नहीं रह जाये. राष्ट्रभाषा का विकास हम सब की जिम्मेदारी है. भारत में लंबे समय तक अलग-अलग शासकों ने राज्य किया, इसका प्रभाव यहां की भाषाओं पर पड़ा.
बिना भाषा-साहित्य के कोई भी समाज निष्प्राण हो जाता है. यह बातें पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने शनिवार को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के हिंदी के सहायक प्राध्यापक डॉ जिंदर सिंह मुंडा द्वारा लिखित पुस्तक हिंदी और मुंडारी भाषा के व्याकरण का तुलनात्मक विवेचन का लोकार्पण सह परिचर्चा में कही. कार्यक्रम विवि सभागार में हुआ.
उन्होंने कहा कि झारखंड राजनीति से लेकर भाषा सबकी प्रयोगशाला है. झारखंड के जनजातीय भाषाओं के विकास के लिए और कार्य करने की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि मातृभाषा सभी के लिए आत्मीय होती है, चाहे कोई भी भाषा-भाषी क्यों न हो. मातृभाषा को लोग अपनी अस्मिता का प्रश्न मानते हैं. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक मुंडारी भाषा के विकास में काफी सहायक सिद्ध होगी. डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सत्यनारायण मुंडा ने झारखंड में जनजातीय भाषा के विकास के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि झारखंड में जनजातीय भाषा के विकास के लिए काफी काम करने की आवश्यकता है. साहित्यकार महादेव टोप्पो ने किताब में उल्लेख किये गये मुंडारी शब्दों के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि किताब में हिंदी से मुंडारी को समझने की कोशिश की गयी है.
डॉ वीवीएन पांडेय ने कहा कि मुंडारी व संस्कृत भाषा के बहुत शब्द मिलते हैं. डॉ अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि भाषा को जीवित रखने के लिए उसमें लिखने-पढ़ने का कार्य होते रहना अनिवार्य है. डॉ गिरधारी राम गौंझू ने कहा कि झारखंड बहुभाषी प्रदेश है. उन्होंने देश की विभिन्न भाषाओं में पायी जानेवाली समानताओं के बारे में बताया. किताब के लेखक डॉ जिंदर सिंह मुंडा ने किताब के बारे में बताया.
स्वागत भाषण विवि के कुलसचिव एनडी गोस्वामी ने किया. मंच संचालन रांची महिला कॉलेज की हिंदी की सहायक प्राध्यापक डाॅ प्रज्ञा गुप्ता ने किया. मौके पर साहित्यकार दयालजी, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ अनिल ठाकुर, डॉ यशोधरा राठौर, डॉ राजेश कुमार सिंह समेत अन्य लोग उपस्थित थे.
