खो-खो में पहचान बना रहे झारखंड के खिलाड़ी, हर दिन करते हैं घंटों अभ्यास

रांची : दौड़ भाग करना और मिट्टी में गिरना, फिर उठकर दोगुना जोश से विपक्षी टीम के खिलाड़ी को पकड़ना और जीतना. ये काम कर रहे हैं खो-खो के खिलाड़ी. एचइसी के जगन्नाथपुर थाने के पीछे लीची बगान में हर दिन सुबह और शाम खो-खो के खिलाड़ी घंटों अभ्यास कर रहे हैं. कोई राष्ट्रीय स्तर […]

रांची : दौड़ भाग करना और मिट्टी में गिरना, फिर उठकर दोगुना जोश से विपक्षी टीम के खिलाड़ी को पकड़ना और जीतना. ये काम कर रहे हैं खो-खो के खिलाड़ी. एचइसी के जगन्नाथपुर थाने के पीछे लीची बगान में हर दिन सुबह और शाम खो-खो के खिलाड़ी घंटों अभ्यास कर रहे हैं. कोई राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा है, तो कोई राज्य स्तरीय स्तर तक पहुंचकर आगे बढ़ने की जद्दोजहद कर रहा है. इनके पीछे हैं कोच अजय झा.
40 साल पहले हुई शुरुआत
कोच अजय झा कहते हैं कि खो-खो का इतिहास झारखंड में 40 साल पुराना है. 1978 में जिला स्कूल में खो-खो की शुरुआत हुई. इसके बाद लगातार रांची की टीम ने विजेता और उपविजेता का खिताब जीता. शुरुआत में मोरहाबादी और जिला स्कूल में प्रशिक्षण शिविर लगाया जाता था. उस समय दोनों सेंटर में सिर्फ 40 खिलाड़ी थे. आज रांची में खो-खो के तीन प्रशिक्षण केंद्र चल रहे हैं और खिलाड़ी लगभग 300.
खिलाड़ियों में है आगे बढ़ने का जज्बा
यहां इस सेंटर पर कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनमें आगे बढ़ने का जज्बा है. मेरी कोशिश यही रहती है कि इनको बेहतर प्रशिक्षण दे सकूं और राष्ट्रीय स्तर तक की प्रतियोगिता में इनकी भागीदारी सुनिश्चित कर सकूं.
-अजय झा, कोच
मैंने 2007 में खो-खो खेलना शुरू किया. पहले थोड़ी मुश्किल हुई. कोच ने इस खेल की तकनीक समझायी. इसके बाद 2009 में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में खेलने का मौका मिला. इसमें हमारी टीम चौथे स्थान पर रही. मेरा सपना एक दिन देश के लिए खेलूं.
कृष्णा कुमार, खिलाड़ी
दो साल पहले यहां सेंटर पर एक दोस्त के साथ आया था, उस समय खो-खो खेलने का मन नहीं था. लेकिन जब इस खेल को देखा, तो तय किया कि इसी खेल में करियर बनाना है.
शेखर कुमार, खिलाड़ी
खो-खो से मेरा जुड़ाव 2015 में हुआ था. उसके बाद मैं इस खेल में अपना करियर बनाने के लिए जुट गया. कोच सर के बेहतर प्रशिक्षण से स्टेट चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और टीम को दूसरा स्थान मिला.
शुभम कुमार, खिलाड़ी
खो-खो खेलने से एक तो फिटनेस बना रहता है और इसके साथ हीराष्ट्रीय स्तर पर आपकी पहचान बनती है. 2013 से मैं इस खेल से जुड़ा. इसके बाद स्कूल नेशनल प्रतियोगिता में शामिल होने का मौका मिला.
मुन्ना कुमार, खिलाड़ी
घरवालों का पूरा सपोर्ट मिला जिसके बाद मैं एक साल पहले इस खेल का प्रशिक्षण लेना शुरू किया. पिछले साल ही गुमला में हुई स्टेट प्रतियोगिता में शामिल हुआ.
रिशु कुमार, खिलाड़ी
अभी तक मैंने दो नेशनल में पार्टिशिपेट किया है. 2011 से मैंने इस खेल से जुड़ी और यहां तक पहुंचने के लिए मुझे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा. चुटिया से जयपाल सिंह स्टेडियम हर दिन सुबह चार बजे पैदल जाती थी. फिर यूनिवर्सिटी नेशनल खेलने का मौका मिला.
पिंकी कुमारी, खिलाड़ी

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