पर्यावरण धर्म का संदेश दे रहे हैं कौशल किशोर

मेदिनीनगर : 1966- 67 का भीषण अकाल. पलामू के इस अकाल को देखने साहित्यकार फनिश्वनाथ रेणु पलामू आये थे. तबके तत्कालीन उपायुक्त कुमार सुरेश सिंह के प्रयास से बड़े पैमाने पर राहत कार्य चला था. बात की गयी थी कि कैसे पलामू का नाता सुखाड़ व अकाल से टूटे इस पर उपाय हो. अकाल व […]

मेदिनीनगर : 1966- 67 का भीषण अकाल. पलामू के इस अकाल को देखने साहित्यकार फनिश्वनाथ रेणु पलामू आये थे. तबके तत्कालीन उपायुक्त कुमार सुरेश सिंह के प्रयास से बड़े पैमाने पर राहत कार्य चला था. बात की गयी थी कि कैसे पलामू का नाता सुखाड़ व अकाल से टूटे इस पर उपाय हो. अकाल व सुखाड़ का स्थायी घर पलामू को माना गया है. हर दूसरे, तीसरे साल यहां सूखा पड़ता है.

लेकिन तब 1966-67 में ही एक बालक जिसकी उम्र उस समय करीब 9 – 10 साल रही होगी. उसके मन में इसका गहरा असर पड़ा. क्योंकि तब यह चर्चा हो रही थी कि पेड़ पौधे तेजी से कट रहे है. इस कारण पलामू में अकाल पड़ रहा है. ऐसे में क्यों नही पेड़ लगाया जाये और बचपन से लिया गया यह संकल्प आज भी जारी है. जी हां बात पलामू के कौशल किशोर जायसवाल की.
कौशल किशोर जायसवाल अब किसी परिचय के मोहताज नहीं है. पर्यावरण के क्षेत्र में पिछले 52 वर्षों से कार्य करते हुए उन्होंने अपने निजी खर्च पर 37 लाख पौधों का वितरण किया है. जबकि पर्यावरण धर्म व वनराखी मूवमेंट को पिछले 42 साल से चला रहे है. इस मूवमेंट के तहत पांच लाख वृक्षों में रक्षा सूत्र बांधा गया है. इसके पीछे सोच यही है कि लोगों का पर्यावरण के प्रति अपनापन का भाव विकसित हो.
मूल रूप से छतरपुर प्रखंड के डाली गांव के रहने वाले श्री जायसवाल ने पर्यावरण के क्षेत्र में काम करते हुए नेपाल, भुटान सहित देश के 20 राज्यों के 70 जिलों में अब तक अभियान चला चुके हैं. कौशल किशोर जायसवाल की माने तो 1966-67 से जो अभियान शुरू किया, उसके बाद यह देखने को मिला कि जो पौधे पेड़ का रूप ले रहे हैं. लोग उसकी कटाई भी कर रहे हैं. इसलिए 1977 में पर्यावरण धर्म चलाया. लोगों को पर्यावरण धर्म से जुड़ने की अपील की. ताकि सुरक्षा हो सके. क्योंकि किसी भी मामले में यदि धर्म जुड़ जाये, तो उसको नुकसान पहुंचाने के पहले लोगों के मन में एक भय पैदा होता है.
कार्यक्रम के दौरान कौशल लोगों को यह संदेश देते है कि शुभ अवसर या घर में होने वाले कोई उत्सव में पौधा जरूर लगाये, ताकि लोगों का जुड़ाव बढ़ते रहे. कौशल बताते है कि इस साल 2019 में दो लाख नि:शुल्क पौधा वितरण सह रोपण कार्यक्रम का निर्णय लिया गया है. पर्यावरण धर्म पर गोष्ठी का आयोजन किया जायेगा. इसके तहत गुजरात के अहमदाबाद से राजस्थान, दिल्ली, यूपी, बिहार, झारखंड, बंगाल, असम, मेघालय, मिजोरम, भूटान में इसका समापन किया जायेगा. इस अभियान की शुरुआत झारखंड के डाली से की जायेगी.
34 अवार्ड मिल चुके हैं
कौशल किशोर जायसवाल को पर्यावरण के क्षेत्र में काम करते हुए अब तक 34 अवार्ड मिल चुके है. जिसमें यूएसए के जॉर्ज ए जेम्स, जर्मनी के प्रोफेसर पैट्रा एवं प्रो. हेकी, नेपाल के सरोज शर्मा, उतराखंड के पर्यावरणविद सुंदर लाल बहगुणा, बंगाल, झारखंड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, वन मंत्री व विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मान दिया जा चुका है.
वह कहते है कि अब लोगों को सोचना होगा. आसमान आग उगल रहा है. अधिकतम तापमान बढ़ रहा है. न्यूनतम तापमान घट रहा हो. इलाके ड्राइजोन हो रहे हों. ऐसे में एक मात्र विकल्प यही है कि लोग पौधा लगाये और वनों की रक्षा के लिए लाठी नहीं, बल्कि वनराखी को अपनाना होगा.

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