लोहरदगा़ झखरा कुम्बा सभागार में जिले के पहान, महतो व पुजारों की वार्षिक कार्यशाला हुई, इसमें पेसा कानून पर विस्तृत चर्चा की गयी. कार्यक्रम की मुख्य वक्ता पूर्व पंचायती राज निदेशक सह आयकर आयुक्त निशा उरांव ने कहा कि रूढ़िजन्य आदिवासी वे हैं, जो अपनी मूल सामाजिक, धार्मिक परंपराओं व कस्टमरी लॉ से जुड़े हैं. ग्रामसभा केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि आदिवासियों के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक केंद्र है. ग्रामसभा को विशेष अधिकार : उन्होंने कहा कि पेसा कानून ग्रामसभा को विशेष शक्तियां देता है और आदिवासी परंपरागत कानून को संविधान में मान्यता मिली है. ग्राम प्रधान, हातू मुंडा व पड़हा राजा पर रीति-रिवाज व धर्म-परंपरा की रक्षा की जिम्मेदारी होती है. वे सरना धर्म, जतरा व विभिन्न पूजा-पाठ को सही रूप देते हैं. धर्मांतरण पर स्पष्ट प्रावधान : निशा उरांव ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 25, 26 व 29 तथा पेसा कानून की धारा 4(घ) व नियमावली 23(i) के तहत ग्रामसभा सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं के संरक्षण के लिए धर्मांतरित आदिवासियों को पारंपरिक पद से हटा सकती है. केन्द्रीय महासचिव ने कहा कि धर्मांतरण होने पर पहान अपनी धार्मिक जिम्मेदारी नहीं निभा सकता. पहनाई भूमि निजी संपत्ति नहीं, बल्कि समुदाय सेवा के लिए दी जाती है. जलेश्वर उरांव ने कहा कि पारंपरिक पदों की उपेक्षा हो रही है, जबकि सीएनटी कानून के बावजूद भूमि लूटी जा रही है. कार्यक्रम में जिला समिति के पदाधिकारी, परंपरा स्वशासन पड़हा व कई बुद्धिजीवी मौजूद थे.
पेसा कानून ग्रामसभा को विशेष शक्तियां देता है : निशा उरांव
पेसा कानून ग्रामसभा को विशेष शक्तियां देता है : निशा उरांव
