भेड़पालन और कंबल निर्माण से आत्मनिर्भर बन रहे हैं गड़ेरी समुदाय के लोग

भेड़पालन और कंबल निर्माण से आत्मनिर्भर बन रहे हैं गड़ेरी समुदाय के लोग

किस्को़ किस्को और सेन्हा प्रखंड के गड़ेरी समुदाय ने पारंपरिक भेड़पालन को स्वरोजगार का रूप देकर न केवल अपनी पहचान बचाई है, बल्कि बेहतर आमदनी भी सुनिश्चित की है. इस व्यवसाय से जुड़कर ग्रामीण घर के अन्य कार्यों के साथ-साथ अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं. वर्तमान में किस्को के बगड़ू जामुन टोली और सेन्हा के चंदकोपा गांव के छह गड़ेरियों ने मिलकर 2000 से अधिक भेड़ पाल रखी हैं. चंदकोपा निवासी सुरेश, सुगम्बर और बंधन गड़ेरी के पास 500-500 भेड़ें हैं, जबकि नरेश के पास 50 भेड़ें हैं. वहीं बगड़ू जामुन टोली निवासी बीगल गड़ेरी के पास 250 और शिव गड़ेरी के पास 150 भेड़ें हैं. इनका मुख्य पेशा भेड़पालन ही है. सुबह होते ही गड़ेरी अपनी भेड़ों को लेकर चराने के लिए खेतों की ओर निकल जाते हैं. एक भेड़ को तैयार होने में लगभग नौ महीने का समय लगता है, जिसकी बाजार में कीमत 5 से 10 हजार रुपये तक होती है. 20 भेड़ों के बालों से एक कंबल तैयार होता है : भेड़पालन के साथ-साथ गड़ेरी उनके बालों से कंबल भी तैयार करते हैं. साल में एक भेड़ से तीन बार बाल उतारे जाते हैं. लगभग 20 भेड़ों के बालों से एक कंबल तैयार होता है, जिसकी कीमत करीब 1000 रुपये होती है. इस तरह कंबल बेचकर गड़ेरी साल भर में कम से कम 30 हजार रुपये अतिरिक्त कमा लेते हैं. यह कंबल गर्मी, बरसात और ठंड तीनों मौसमों में उपयोगी होता है. बिक्री के लिए गड़ेरी समुदाय को बाजारों में भटकना नहीं पड़ता. सिसई, लोहरदगा और बेड़ो के व्यापारी खुद उनके घरों तक पहुंचकर भेड़ और कंबल खरीद लेते हैं. बिना किसी अतिरिक्त निवेश और सरकारी मदद के, यह समुदाय अपनी मेहनत के दम पर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि इस व्यवसाय में जोखिम कम और मुनाफा अधिक है.

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By SHAILESH AMBASHTHA

SHAILESH AMBASHTHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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