लोहरदगा रेल पुल मरम्मत : दावों के बीच कछुए की गति से काम, यात्री हलकान

लोहरदगा रेल पुल मरम्मत : दावों के बीच कछुए की गति से काम, यात्री हलकान

लोहरदगा़ कोयल नदी पर स्थित क्षतिग्रस्त रेलवे पुल की मरम्मत का काम कछुए की गति से चल रहा है. दक्षिण पूर्व रेलवे के जीएम ने युद्धस्तर पर काम करने और फरवरी अंत तक परिचालन शुरू करने का निर्देश दिया था, लेकिन माह बीतने को है और स्थिति जस की तस है. रेलवे के सूत्र बताते हैं कि जिस गति से यहां काम होना चाहिए था उस गति से काम नहीं किया जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, कोलकाता से मंगाया गया लोहे का गर्डर छोटा पड़ गया, जिससे काम बाधित हुआ. अब नया गर्डर मंगाया जा रहा है. साथ ही, पुल के अन्य पिलर भी क्षतिग्रस्त पाये गये हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो गयी है. अधिकारियों के दौरे और बयानों के बावजूद कार्यस्थल पर सक्रियता नदारद है, जिससे परिचालन शुरू होने में अभी लंबा वक्त लगने के आसार हैं. यात्री परेशान, रेलवे का दावा हवा-हवाई, ईरगांव में हो रही यात्रियों की फजीहत : 23 फरवरी को दक्षिण-पूर्व रेलवे के एजीएम ने कार्यस्थल का दौरा किया और कहा कि मार्च से रेल इस पुल से गुजरने लगेगी, उनके साथ डीआरएम भी मौजूद थे लेकिन काम करने की गति तेज नहीं हुई. चार जनवरी से पुल क्षतिग्रस्त होने के कारण रांची-लोहरदगा-टोरी मेमू ट्रेन केवल ईरगांव स्टेशन तक ही जा पा रही है. यात्री लोहरदगा तक का टिकट 20 रुपये में ले रहे हैं, लेकिन उन्हें ईरगांव में ही उतार दिया जाता है, जहां से लोहरदगा जाने के लिए टेंपो का किराया 50 रुपये लग रहा है. यात्रियों का आरोप है कि रेलवे उनके साथ धोखा कर रही है. पर्याप्त बसें नहीं, यात्रियों में मची रहती है आपाधापी : रेलवे ने ईरगांव से लोहरदगा तक मुफ्त बस सेवा का दावा किया है, लेकिन यहां स्थिति विपरीत है. एक ट्रेन में लगभग 1,200 यात्री पहुंचते हैं, जबकि मात्र तीन बसें लगायी गयीं हैं. एक बस की क्षमता 52 है. वहीं, 300 से अधिक एमएसटी धारक भी इसी रूट पर सफर करते हैं. बसों की भारी कमी के कारण यात्रियों में हमेशा आपाधापी मची रहती है. यात्रियों की मांग है कि या तो बसों की संख्या बढ़ाई जाये या फिर टिकट केवल ईरगांव तक ही काटा जाये. जानलेवा सड़क, खतरे में सफर : ईरगांव से लोहरदगा के बीच सड़क निर्माण का काम चल रहा है. जगह-जगह नाली के लिए खोदे गये गड्ढे हर पल दुर्घटना को आमंत्रण दे रहे हैं. ऐसी जर्जर सड़क पर बड़ी बसों का परिचालन काफी जोखिम भरा है, फिर भी बस संचालक रेलवे को सहयोग कर रहे हैं.

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By Shailesh ambashtha

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