बेतला़ पलामू प्रमंडल के लातेहार, गढ़वा और पलामू जिलों की गाय और बकरियों को झारखंड में विशिष्ट नस्ल के रूप में पंजीकृत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है. इस प्रमंडल की गाय और बकरियों को अब तक किसी नस्ल का दर्जा नहीं मिल पाया था, जबकि यहां इनकी संख्या काफी अधिक है. देश के अन्य हिस्सों में गाय और बकरियों को अलग-अलग नस्लों के नाम से जाना जाता है. गाय की स्वदेशी नस्लों में गिर, अमृतमहल, बाचौर, बद्री, बारगुर, मेवाती, जर्सी और ब्राउन स्विस प्रमुख हैं, जबकि बकरियों की प्रमुख नस्लें जमुनापारी, बीटल, सुरती, जखराना, बरबरी, ब्लैक बंगाल, सिरोही, मारवाड़ी, उस्मानाबादी, कच्छी और गद्दी हैं. गायों की पहचान मेदिनी गाय व बकरियों की पहचान पलामू बकरी के रूप में: अब पलामू प्रमंडल की गायों की पहचान मेदिनी गाय और बकरियों की पहचान पलामू बकरी के रूप में होगी. इसे लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की उच्चस्तरीय टीम ने 18 से 21 सितंबर तक प्रमंडल का दौरा किया. टीम में राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल के डॉ सतपाल दीक्षित, केंद्रीय गाय अनुसंधान संस्थान मेरठ के डॉ सुशील कुमार, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के डॉ गोपाल दास, आइसीएआर पूर्वी अनुसंधान परिषद, पटना के डॉ पीसी चंद्रन और रांची केंद्र की डॉ रीना कमल शामिल थे. टीम ने लातेहार, गढ़वा और पलामू के विभिन्न गांवों में जाकर गाय और बकरियों का भौतिक सत्यापन किया और उनके लक्षण, विशेषताओं का बिंदुवार अवलोकन किया. स्थानीय लोगों से जानकारी लेकर पशुओं की पहचान और दर्जा सुनिश्चित की गयी. इस दौरान पलामू के छतरपुर में पशु स्वास्थ्य शिविर भी आयोजित किया गया. आइसीएआर की टीम ने मेदिनी गाय और पलामू बकरी की विशेषताओं का विश्लेषण कर इसे झारखंड की विशिष्ट नस्ल के रूप में पंजीकृत करने की प्रक्रिया प्रारंभ की है. विशेषज्ञों का उद्देश्य इन नस्लों के संरक्षण के साथ-साथ उनके गुणों और विशेषताओं को पहचान कर आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षण सुनिश्चित करना है. इस पहल से प्रमंडल के पशुपालन और ग्रामीण विकास को भी मजबूती मिलेगी.
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