लातेहार : प्रखंड के घघरी गांव में आज भी आदिम जनजाति परिवार के लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन जीने को विवश हैं. जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर घघरी गांव नावागड़ पंचायत में है, यहां पहुंचना आसमान से तारा तोड़ कर लाने के बराबर है. क्योंकि कोने पुलिस पिकेट से गांव की दूरी करीब सात किलोमीटर है, लेकिन पथ नहीं होने के कारण एक नदी पार कर पगडंडी और उबड़ खाबड़ रास्ते के सहारे ही गांव पहुंचा जा सकता है.
सात किमी पथ नहीं, बीमार पड़ने पर बचना हो जाता है मुश्किल
लातेहार : प्रखंड के घघरी गांव में आज भी आदिम जनजाति परिवार के लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवन जीने को विवश हैं. जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर घघरी गांव नावागड़ पंचायत में है, यहां पहुंचना आसमान से तारा तोड़ कर लाने के बराबर है. क्योंकि कोने पुलिस पिकेट से गांव की दूरी […]

घघरी गांव में कई अलग अलग टोले हैं जो करीब तीन किलोमीटर में फैला हुआ है. गांव में इलाज की उचित व्यवस्था नहीं है, ऐसे में लोगों को दस किलोमीटर दूर नावागढ़ उप स्वास्थ्य केंद्र आना पड़ता है, जो उचित पथ नहीं होने के कारण काफी मुश्किल भरा काम होता है. इसके अलावा ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल रहा है.
घघरी गांव आदिम जनजाति बाहुल्य गांव है. इसमें 35 घर हैं जिसकी आबादी 163 है. 35 घरों में 18 घर आदिम जनजाति परहिया परिवार के हैं. अन्य में खरवार एवं पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं. गांव में सिंचाई एवं अन्य काम की व्यवस्था नहीं होने के कारण अधिकांश लोग पलायन कर जाते हैं. गांव में सुविधा के नाम पर केवल पेयजल की व्यवस्था है. सोलर आधारित टंकी से ग्रामीणों को पानी मिल रहा है. इसके अलावा गांव में एक विद्यालय एवं एक आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है.
बांस का सामान बेच कर करते हैं गुजारा
गांव की बिफनी परहिन कहती हैं पति की मौत के बाद बेटा और बेटी गांव छोड़ कर चले गये, तब से वह गांव के बासदेव परहिया भाई बन कर उसकी मदद कर रहे हैं. वह जंगल से बांस ला कर देते हैं जिसका सामान बना कर पास की दुकान में बेचने के बाद जो राशि मिलती है उसी से गुजारा चल रहा है. टूटे फूटे झोपड़ीनुमा मकान में रहते हैं.
आज तक गांव नहीं आया कोई पदाधिकारी
दंपती सोमा परहिया व सुखनी परहिन कहते हैं कि आज तक गांव में कोई पदाधिकारी नहीं आया है. राशन कार्ड और घर की जानकारी नहीं है. कई बार मुखिया को इसकी शिकायत की लेकिन अब तक कोई लाभ नहीं मिला है. अपनी पुरानी संस्कृति के अनुसार बांस की सामग्री बना कर हमलोग जीवन यापन कर रहे हैं.
कई ग्रामीणों का राशन कार्ड भी नहीं बना
65 वर्षीय बासदेव परहिया ने कहा कि दस वर्ष पहले हम लोगों का राशन कार्ड था, जिससे समय समय पर राशन मिलता था. उसके बाद राशन कार्ड नया बनाने के नाम पर राशन दुकानदार द्वारा लिये जाने के बाद अब तक राशन कार्ड नहीं बना है.