लातेहार : लातेहार जिला की ग्रामीण एवं शहरी अर्थव्यवस्था चरमरा सी गयी है. इसका असर दोनों क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में लाह व महुआ की लगातार कम होती पैदावार किसानों की कमर तोड़ रही है.
वहीं शहरी क्षेत्र में लोगों के पास आय का कोई साधन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. इसका सीधा असर लातेहार के बाजार पर दिख रहा है. बाजार की रौनक फीकी पड़ गयी है. यहां तक कि पर्व त्योहारों में भी लोग सिर्फ रस्मों की अदायगी ही करते हैं.
व्यवसाय ही मुख्य आधार : शहर के लोगों के आय का मुख्य स्त्रोत व्यवसाय है. सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी भी स्थानीय लोग नहीं है. 90 के दशक तक शहर में दर्जनों आढ़त थे. इन आढ़तों में लाह, महुआ, तेलहन व दलहन की खरीदारी होती थी. अप्रैल से जून-जुलाई तक लाह की फसल की खरीदारी होती थी.
एक जमाना था जब लातेहार को लाह के लिए विश्व भर में अग्रणी माना जाता था. लेकिन आज यहां लाह की पैदावार 20 प्रतिशत भी नहीं रह गयी है. यही हाल महुआ का है. लिहाजा व्यवसायियों का व्यवसाय ठप पड़ गया है. आढ़तों में ताले लटक गये हैं. बाजार की रौनक यहीं से कम पड़ने लगी.
नहीं लगे खनिज आधारित उद्योग-धंधे : प्रकृति ने लातेहार जिला को अपार खनिज संपदा दी है. जिले में कोयला एवं बाक्साइट का अकूत भंडार है. लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज तक लातेहार में खनिज पर आधारित कल- कारखाने नहीं लग सका. वर्ष 2005 में तत्कालीन अजरुन मुंडा की सरकार ने हिंडाल्को के साथ लातेहार मे अल्युमिनियम कारखाना एवं कैप्टिव पावर प्लांट लगाने के लिए एमओयू किया, तो लोगों को लगा शायद लातेहार के दिन बहुरेंगे.
लेकिन ऐन मौके पर हिंडाल्को ने यह कह कर कि लातेहार में पर्याप्त पानी नहीं है, कारखाना को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया. इसके बाद से लोगों के दिलों में निराशा घर गयी. लोग आज भी यहां खनिज संपदा आधारित कल कारखानों की बाट जोह रहे हैं.
