जयनगर. रोजा न केवल शारीरिक भूख और प्यास से बचने का नाम है, बल्कि इसका उद्देश्य आत्म नियंत्रण, शांति और अल्लाह के करीब जाना है. रोजा इंसान को संयम और परहेजगारी की शिक्षा देता है. उक्त बातें डिवाइन पब्लिक स्कूल के प्राचार्य इफ्तेखार अहमद ने रमजान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कही. उन्होंने कहा कि जब इंसान अपनी इच्छाओं पर काबू पाता है, तो वह अपनी आत्मा को शुद्ध करता है. रोजा इंसानियत के असल मूल्यों को बढ़ावा देता है. जब हम भूख और प्यास का एहसास करते हैं, तो हमें गरीबों और वंचितों का दर्द महसूस होता है. यह एहसास हमें उनके साथ सहानुभूति रखने और उनकी मदद करने के लिए प्रेरित करता है. रोजा केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि यह हमारा संबंध सच्ची इंसानियत से जोड़ता है. हमें सीख मिलती है कि सिर्फ अपनी के दुखों को महसूस करना और उनकी मदद करना असली इंसानियत है. रोजा रखने के दौरान हमें अपने शब्दों और कर्मों पर काबू रखना चाहिए, ताकि हमारा रोजा सही मायने में स्वीकार हो. वास्तव में रोजा इंसान को आत्म-नियंत्रण, संयम और इंसानियत को समझने का अवसर प्रदान करता है. यह हमें सिखाता है कि सच्चा उपवास तभी माना जाता है, जब हम दूसरों के प्रति दयालु और विनम्र रहें.
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