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गांव की सरकार : नाराज हैं सिमडेगा के कोलेबिरा प्रखंड के ग्रामीण, विकास नहीं तो वोट नहीं का दे रहे नारा

सिमडेगा जिला अंतर्गत कोलेबिरा प्रखंड के बोंगराम पंडरापानी गांव में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. इस गांव के ग्रामीण अब विकास नहीं, तो वोट नहीं का नारा देकर एकजुट हो रहे हैं. ग्रामीण इस गांव में आज तक विकास नहीं पहुंचने पर खासे नाराज हैं.

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
Jharkhand news: गांव में मूलभूत सुविधाओं के अभाव को बताते बोंगराम पंडरापानी गांव के ग्रामीण.
Jharkhand news: गांव में मूलभूत सुविधाओं के अभाव को बताते बोंगराम पंडरापानी गांव के ग्रामीण.
प्रभात खबर.

Jharkhand Panchayat Chunav: सिमडेगा प्रखंड अंतर्गत कोलेबिरा प्रखंड क्षेत्र के रैसिया पंचायत स्थित बोंगराम पंडरापानी गांव हरिजन बहुल है. आजादी के बाद भी इस गांव में विकास की किरण आज तक नहीं पहुंची है. इस पंचायत चुनाव में इस गांव के ग्रामीण एकजुट होकर प्रत्याशियों का विरोध कर रहे हैं. ग्रामीणों ने गांव में विकास नहीं, तो वोट नहीं, का नारा देकर विरोध जता रहे हैं.

Jharkhand news: लकड़ी की पुलिया बनाकर आवागमन करने को बाध्य हैं ग्रामीण.
Jharkhand news: लकड़ी की पुलिया बनाकर आवागमन करने को बाध्य हैं ग्रामीण.
प्रभात खबर.

बोंगराम पंडरापानी गांव के ग्रामीण डिबरी जलाकर कर रहे गुजर-बसर

बोंगराम पंडरापानी में गांव की सरकार बने 11 वर्ष से अधिक समय बीत गये, लेकिन आत तक विकास इस गांव में नहीं पहुंच पायी. गांव में 20 से 25 घर है, लेकिन आज भी लोग डिबरी जलाकर गुजर-बसर कर रहे हैं. यह गांव पंचायत मुख्यालय से तीन किलोमीटर और प्रखंड मुख्यालय से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है.

मूलभूत समस्याओं का अभाव

हरिजन जाति अंतर्गत आनेवाले भोक्ता समुदाय के इस गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची. गांव तक आवागमन के लिए अच्छी सड़क भी नहीं है. लोग गांव तक आने-जाने के लिए पगडंडियों का सहारा लेते हैं. वहीं, नाले पर पुलिया नहीं बनने के कारण लोग बरसात के दिनों में खुद की बनायी लकड़ी पुल का सहारा लेते हैं. बरसात के दिनों में गांव टापू जैसा बन जाता है. गांव के लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. गांव में अगर कोई बीमार पड़ जाये, तो उसे हॉस्पिटल ले जाने में काफी परेशानी होती है. विशेषकर विद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को बरसात के दिनों में नदी में पुल नहीं होने के कारण काफी परेशानी उठानी पड़ती है. गांव के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. गांव में आज तक आंगनबाड़ी केंद्र भी नहीं खुला है. जिसके चलते आंगनबाड़ी से संचालित योजनाओं का लाभ गांव की महिलाएं और बच्चों को नहीं मिल पाता.

दो साल से नहीं बना जलमीनार

स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव की सरकार बनने के बाद उनलोग ने सोचा कि गांव का विकास होगा, लेकिन 11 वर्षों तक जितने भी मुखिया बने, वो गांव के विकास पर ध्यान नहीं दिया. विकास के नाम पर गांव में कुछ लोगों का प्रधानमंत्री आवास एवं मनरेगा योजना से कुछ कार्य हुए हैं. वहीं, ग्रामीणों ने बताया कि गांव में पेयजल के लिए पुराने चापाकल में जलमीनार लगाने का कार्य किया जा रहा था, लेकिन इस जलमीनार निर्माण का कार्य भी पिछले दो साल से अधूरा पड़ा हुआ है.

गांवों की समस्या के समाधान को लेकर ग्रामीणों की बैठक

गांव की समस्या को लेकर 30 अप्रैल को नारायण सिंह की अध्यक्षता में ग्रामीणों की एक आवश्यक बैठक हुई. ग्रामीणों ने कहा कि 2022 के त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव में गांव के लोग तभी भाग लेंगे जब गांव का विकास होगा. गांव के विकास के लिए जनप्रतिनिधियों द्वारा ध्यान नहीं दिया गया. जनप्रतिनिधि केवल वोट मांगने के लिए गांव आते हैं और चुनाव खत्म होते ही वह लोग गांव वाले को भूल जाते हैं. इस बैठक में गांव के सुदर्शन सिंह, जनक सिंह, नारायण सिंह, सावित्री देवी, कस्टू सिंह, नकुल सिंह, प्रदीप सिंह, लीलावती देवी, विनोद सिंह, चरकू सिंह, रोपना सिंह, सतीश सिंह, रामजतन सिंह, अजय सिंह, झरिया देवी के अलावे अन्य ग्रामीणों ने भी भाग लिया.

ग्रामीणों ने गांव का विकास नहीं, तो वोट नहीं का दिया नारा

यहां के ग्रामीण गांव की विभिन्न समस्या के समाधान को लेकर एकजुट होने लगे हैं. इस पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों का विरोध करने का मन बना लिया है. इसको लेकर ग्रामीणों ने गांव का विकास नहीं, तो वोट नहीं का नारा दिया. गांव की सावित्री देवी का कहना है कि गांव में आज तक किसी प्रकार का कोई विकास नहीं हुआ. केवल वोट के समय जनप्रतिनिधि आते हैं उसके बाद भूल जाते हैं. वहीं, सुदर्शन सिंह का कहना है कि गांव में एकमात्र चापाकल की स्थिति दयनीय है. गर्मी के दिनों में काफी परेशानी हो रही है.

लकड़ी की पुलिया के सहारे होता आवागमन

ग्रामीण कलावती देवी का कहना है कि गांव में दो साल पहले सोलर संचालित जलमीनार बनाने के लिए खंभा लगाया गया था, लेकिन आज तक सोलर संचालित जलमीनार नहीं बन सका. ग्रामीण नारायण सिंह का कहना है कि गांव तक आने के रास्ते में एक नाला पड़ता है. काफी मांग करने के बाद भी इस नाले के ऊपर पुलिया निर्माण नहीं कराया गया. जिसके कारण बरसात के दिनों में आने-जाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. ग्रामीणों के सहयोग से लकड़ी की पुलिया बनाया गया है.

ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर ग्रामीण चलने को मजबूर

वहीं, ग्रामीण लीला देवी का कहना है कि आज तक इस गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं खोला गया. जिसके चलते गांव की महिला एवं छोटे-छोटे बच्चों को आंगनबाड़ी का लाभ नहीं मिल पा रहा है. जनक सिंह का कहना है कि गांव की सरकार बनने के बावजूद आज तक गांव में विकास नहीं हुआ. ऐसे में हम गांव की सरकार को क्यों चुने. हेमंती देवी का कहना है कि गांव में आने-जाने के लिए सड़क की व्यवस्था नहीं है. लोग ऊबड़-खाबड़ पगडंडी के सहारे गांव आते हैं. वहीं, फूडी देवी कहती है कि गांव में मूलभूत सुविधा के लिए कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों को आवेदन देकर मांग की गई, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ.

आज तक गांव में नहीं पहुंची विकास की किरण

ग्रामीण बीरबल सिंह का कहना है कि आज भी इस गांव के लोग ढिबरी युग में जीने को विवश हैं. गांव में बिजली के लिए अनेकों बार स्थानीय जनप्रतिनिधि, विधायक और सांसद से गुहार लगायी गयी. लेकिन, आज तक गांव में बिजली नहीं पहुंच पायी. वहीं, राजेंद्र सिंह का कहना है कि गांव में विकास के नाम पर कुछ वर्ष पूर्व मनरेगा योजना अंतर्गत मोरम पथ का निर्माण कराया गया था. विकास के नाम पर गांव की सरकार बनने के बाद भी इस छोटे से गांव में आज तक विकास की किरण नहीं पहुंच पायी है.

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