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उपेक्षित है बड़कागांव में स्वतंत्रता सेनानियों का शहीद स्तंभ, नहीं ले रहा कोई सुध

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
Jharkhand News : स्वतंत्रता सेनानियों का शहीद स्तंभ आज भी उपेक्षित है.
Jharkhand News : स्वतंत्रता सेनानियों का शहीद स्तंभ आज भी उपेक्षित है.
प्रभात खबर.

Jharkhand News, Hazaribagh News, बड़कागांव (संजय सागर) : 'अब बस जिंदगी का गुमा है, भरम गुलामी में जीना ना मरने से कम है. सितमगर ने इन्हें जो गलफत में पाया, तुरंत दामें फितरत में अपने फसाया. आजादी की लड़ाई में सब न्योछावर किया और कुछ ना मिला, ना उठने की ताकत, ना चलने की दम है'... यह हाल उनका है जिन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लिया तथा अपने प्राण गवाएं. उनकी याद 26 जनवरी गणतंत्र दिवस एवं 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस को आती है. उसके बाद उन्हें कभी याद नहीं किया जाता है. हजारीबाग जिला अंतर्गत बड़कागांव प्रखंड मुख्यालय के पास शहीद स्थल के नाम से अंकित कई स्वतंत्रता सेनानियों को शहीद स्तंभ है, लेकिन उपेक्षा के कारण आज असुरक्षित है. इस दिशा में आज तक किसी ने कोई ठोस पहल नहीं की है. यही कारण है आज यह शहीद स्थल उपेक्षित है.

कई ऐसे जीवित स्वतंत्रता सेनानी हैं जो आज सरकारी उपेक्षा के कारण जिंदगी को विवश हैं. तो कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हैं जिनका प्राण आजादी की लड़ाई में न्योछावर हो गया. लेकिन, उनके परिजनों को आज भी गरीबी के साये में जिंदगी सिसक रही है. चांडिल गांव की बसंती राय अपने आश्रम में खाट पर कई वर्षों तक पड़ी रही, लेकिन सरकारी उपेक्षा के कारण उन्होंने गत वर्ष दम तोड़ दी. हालांकि, प्रशासनिक विभाग अपनी औपचारिकता निभाने की पूरी कोशिश की थी. महात्मा गांधी के पुत्री के समान वर्धा आश्रम में पलकर बड़ी होने वाली बसंती राय आचार्य विनोबा भावे, काका को लेकर, श्रीमन्नारायण, वीपी सिंह आजाद ,मधुकर राव चौधरी, मिलीलानी दासगुप्ता एवं डॉ समीर रंजन सिंह के साथ में भाग लेने वाली बसंती राय की स्थिति पर कोई भी सरकार सुधि नहीं लिया.

केरेडारी प्रखंड के बेल चौक निवासी स्वतंत्रा सेनानी आनंदी साव भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ भाग लिये थे. उनका निधन भी 7-8 वर्ष पहले हो गया. वह जिंदगी भर तिरंगे को कंधे में टांगते रहे, पर उन्हें एवं उनके परिजनों को आज तक कोई सुध ही नहीं लिया. बड़कागांव का प्रयाग रविदास, प्रकाल रविदास पेशे से राजमिस्त्री थे, लेकिन जब भारत छोड़ो आंदोलन हजारीबाग में 9 अगस्त 1942 को शुरू हुई थी, तो उन्होंने भी इस आंदोलन में कूद पड़े थे. इन्हें अंग्रेज सिपाही पकड़ कर जेल ले जा रहे थे. उसी दौरान ये दोनों रास्ते में शौच के बहाने बनाकर भाग खड़े हुए थे. इतना ही नहीं इन्होंने रामगढ़ अधिवेशन में भी भाग लिया था. लेकिन, प्रयाग रविदास एवं प्रकाल रविदास को सरकारी सुविधा कभी नहीं मिली. उनका निधन 30 वर्ष पहले हुआ, लेकिन आज तक उनके परिजनों की कोई सुध नहीं ली.

आनंदी साव, प्रयाग रविदास, प्रकाल रविदास आजादी के बिहान को केवल स्वागत ही नहीं किया, बल्कि इस बिहान के लिए लड़ाई भी लड़ी. 18 सितंबर, 1925 में महात्मा गांधी ने हजारीबाग एवं मांडू का दौरा किये थे. उस दौरान गांधीजी के नेतृत्व में उन्होंने चरखा चलाने के लिए हजारीबाग जिले के प्रत्येक क्षेत्र का दौरा किया. 1930 में गांधीजी दोबारा हरिजन आंदोलन के दौरान हजारीबाग आयें. गांधी जी ने आनंदी साव एवं राजा के बंगले में राजमिस्त्री का काम कर रहे प्रयाग रविदास एवं प्रकाल रविदास को बुलाकर जिले एवं ग्रामीण क्षेत्रों की गतिविधियां ली थी. ये तीनों गांधी जी के साथ हरिजन स्कूल का दौरा भी किये थे. उस समय हरिजन नेता सत कोलंबस कॉलेज के प्राध्यापक की पुत्री सरस्वती देवी थी.

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व आनंदित साव ने भी किया था. इसके अलावा हजारीबाग के कलेक्ट्रेट पर तिरंगा झंडा फहराने वाले स्वतंत्रता सेनानी केदार सिंह, सुधीर मलिक, कस्तूरी मल अग्रवाल, सीताराम अग्रवाल, चेत लाल तेली, रामदयाल साव, कांशी राम मुंडा थे. इनलोगों को IGR के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था. इतना ही नहीं, बड़कागांव प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों से सूबेदार सिंह, चेता मांझी, लखी मांझी, ठाकुर मांझी, खैरा मांझी, बड़कू मांझी, छोटका मांझी, गुर्जर महतो ने भी आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इन स्वतंत्रता सेनानियों का बड़कागांव ब्लॉक मुख्यालय के पास शहीद स्थल में नाम अंकित किया गया है. लेकिन, यह शहीद स्तंभ आज भी असुरक्षित है.

जिस स्तंभ को सम्मान मिलना चाहिए, वह सम्मान आज खुले आसमान के नीचे बेकार पड़ा दिखाई पड़ रहा है. जिस स्थान के पास शहीदों को पूजन व नमन करना चाहिए, उस स्तंभ के पास आज कई जानवर बैठे दिखाई पड़ते हैं. ऐसे में शहीद स्तंभ का हमेशा मजाक उड़ाया जाता रहा है. इस स्तंभ को खुले आकाश में बेकार पड़े देख कर ऐसा लगता है जैसे शहीदों का आत्मा अगर इस परिस्थिति को देखती होंगी, तो उन्हें काफी दुख लगता होगा. वह आत्मा अपने आप को कोसते होंगे की जिस पीढ़ी के लिए मैंने आजादी दी. वह पीढ़ी आज हमारा मजाक उड़ा रही है. आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सेनानी की उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं.

सरकार ने वर्ष 1992 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने हजारीबाग जेल का दौरा करने के दौरान घोषणा किया था कि अंग्रेजी सत्ता की लड़ाई लड़ने वाले शहीदों का स्मारक बनाया जायेगा. उनके परिजनों को सरकारी लाभ दिया जायेगा, लेकिन झारखंड राज्य अलग होने के बावजूद भी आज तक यह पहल नहीं किया हुआ.

Posted By : Samir Ranjan.

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