गुमला में पहली बार 1932 में मशाल जलाकर निकाला गया था जुलूस

गुमला में रामनवमी पर्व का इतिहास अत्यंत गौरवमयी है.

: 1964 ईस्वी से गुमला शहर में झांकी निकालने की परंपरा की शुरुआत हुई.

दुर्जय पासवान, गुमला

गुमला में रामनवमी पर्व का इतिहास अत्यंत गौरवमयी है. हनुमान की जन्मस्थली होने के कारण यहां रामनवमी जुलूस की परंपरा विशेष महत्व रखती है. 1932 से, यानी भारत की आज़ादी से पहले से ही, गुमला में रामनवमी का जुलूस निकाला जा रहा है. उस समय गुमला एक छोटा कस्बा था और साधन सीमित थे. लोग लकड़ी का गदा बनाकर जुलूस में निकलते थे और उसी से करतब दिखाते थे. बिजली न होने के कारण मशाल और पेट्रोमेक्स की रोशनी में जुलूस और खेल का प्रदर्शन होता था. अखाड़ा सजता था, जिसमें पहलवान गदा-कुश्ती करते थे.

इस परंपरा की शुरुआत स्वर्गीय टोहन बाबू, मथुरा प्रसाद सिन्हा, फतेहचंद मंत्नी, छेदी केशरी, गयादत्त पांडेय, गंगा महाराज तिवारी और रघुवीर साहू जैसे अग्रणी लोगों ने की थी. वहीं दलजीत गुप्ता, मंतु राम, महावीर राम और सीटू पासवान जैसे खिलाड़ी उस समय के प्रसिद्ध कलाकार थे, जो खेल और करतब का प्रदर्शन करते थे.

1964 से गुमला में झांकी निकालने की परंपरा भी शुरू हुई. झांकियों में धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को प्रस्तुत किया जाता था और इसमें प्रतिस्पर्धा भी होती थी. धीरे-धीरे यह परंपरा विशाल रूप लेती गयी और आज यह हिंदुत्व की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है.

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By VIKASH NATH

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