घाघरा. घाघरा प्रखंड मुख्यालय की लगभग 60 वर्षीय गीता कुमारी त्याग, सेवा और ममता की ऐसी मिसाल हैं, जिन्हें आज इलाके के सैकड़ों बच्चे और लोग मां जैसा सम्मान देते हैं. जैविक मां नहीं बनने के बावजूद उन्होंने अपना पूरा जीवन परिवार, बच्चों और समाज के लिए समर्पित कर दिया. गीता कुमारी ने रांची वीमेंस कॉलेज से आइएससी की पढ़ाई पूरी की. आर्थिक व पारिवारिक परेशानियों के कारण उनकी पढ़ाई कुछ समय के लिए बाधित हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बीए की डिग्री हासिल की. इस दौरान परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. पहले पिता लकवाग्रस्त हुए और बाद में उनका निधन हो गया. इसके बाद बड़े भाई योगेंद्र नाथ राम गंभीर बीमारी से जूझने लगे. गीता ने पूरी निष्ठा से उनकी सेवा की, लेकिन उन्हें बचा नहीं सकीं. बाद में छोटी बहन अनीता कुमारी कैंसर से पीड़ित हो गयीं, जिनके इलाज के लिए वह दो वर्षों तक मुंबई और टाटा अस्पताल में रहीं. इसके बावजूद बहन की जान नहीं बच सकी. इन परिस्थितियों ने गीता कुमारी को अंदर तक तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने खुद को संभालते हुए वर्ष 1984 में सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में शिक्षिका के रूप में योगदान दिया. बाद में वह विद्यालय की प्रधानाध्यापिका भी बनीं. करीब 25 वर्षों तक बच्चों को शिक्षा देने के दौरान छात्रों ने उन्हें मां जैसा सम्मान दिया. गीता कुमारी कहती हैं कि वह चाहतीं तो शादी कर अपना घर बसा सकती थीं, लेकिन बीमार भाई-बहन को छोड़ना उन्हें मंजूर नहीं था. वर्ष 2010 में वह वार्ड सदस्य चुनी गयीं और 2015 में घाघरा पंचायत की मुखिया बनीं. आज वह सेवा, त्याग और मातृत्व की प्रेरक मिसाल हैं.
अपनों के लिए कुर्बान कर दी जिंदगी, सैकड़ों बच्चों की मां बनीं गीता कुमारी
शादी और अपना परिवार बसाने का सपना छोड़ समाज सेवा व शिक्षा को बनाया जीवन का उद्देश्य
