: संस्कार और कर्तव्य निभाने के लिए जेंडर नहीं, बस इरादे मजबूत होने चाहिये. प्रतिनिधि, गुमला गुमला की पांच बेटियों ने समाज में प्रचलित परंपरा को तोड़कर एक नई मिसाल कायम की है. आमतौर पर अंतिम संस्कार की रस्मों को पुरुषों का अधिकार माना जाता है, लेकिन कौशल्या देवी की बेटियों ने यह साबित किया कि संस्कार निभाने के लिए जेंडर नहीं, बल्कि मजबूत इरादों और जिम्मेदारी की आवश्यकता होती है. 76 वर्षीय कौशल्या देवी का निधन 23 मार्च को हुआ. उनके कोई पुत्र नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपनी पांचों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर समाज के प्रतिष्ठित पदों तक पहुँचाया. मां के निधन के बाद बेटियों ने तय किया कि वे स्वयं अंतिम संस्कार करेंगी और किसी रिश्तेदार का इंतजार नहीं करेंगी. बड़ी बेटी नीलिमा ओहदार शिक्षिका हैं, विद्या ओहदार थाना प्रभारी, ज्योति ओहदार योग शिक्षिका, अर्चना ओहदार रेलवे में नर्स और अल्पना ओहदार शिक्षिका हैं. इन बेटियों ने अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया और पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार संपन्न किया. जब लोगों ने देखा कि अर्थी के चारों कोनों पर बेटियां खड़ी हैं, तो हर किसी की आंखें नम हो गईं और उनके साहसिक निर्णय की सराहना की. बेटियों ने कहा—“जिस मां ने हमें लाड़-प्यार से पालकर हमारे कंधों को मजबूत बनाया, उनका अंतिम सफर भी इन्हीं कंधों पर होना चाहिए.”
गुमला की पांच बेटियों ने तोड़ी समाज की बेड़ियां, मां की अर्थी को दिया कंधा
गुमला की पांच बेटियों ने समाज में प्रचलित परंपरा को तोड़कर एक नई मिसाल कायम की है.
