राजमहल परियोजना का भविष्य संकट में

जटिलता : जमीन अधिग्रहण की दिशा में बने गतिरोध को हल करने का नहीं मिल रहा रास्ता इस वर्ष भादोतोला गांव का अधिग्रहण न होने पर अगले वर्ष खनन होगा बंद जिला उपायुक्त, ग्रामीणों के साथ कई स्तर की बैठकों के बाद भी सहमति नहीं चार सौ ग्रामीणों को मिला मुआवजा, पांच सौ ग्रामीणों के […]

जटिलता : जमीन अधिग्रहण की दिशा में बने गतिरोध को हल करने का नहीं मिल रहा रास्ता

इस वर्ष भादोतोला गांव का अधिग्रहण न होने पर अगले वर्ष खनन होगा बंद
जिला उपायुक्त, ग्रामीणों के साथ कई स्तर की बैठकों के बाद भी सहमति नहीं
चार सौ ग्रामीणों को मिला मुआवजा, पांच सौ ग्रामीणों के लिए बना गतिरोध
सांकतोडिया. ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (इसीएल) में सर्वाधिक उत्पादन करने वाली राजमहल परियोजना के विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण में हो रही परेशानी के कारण इसके अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं. कंपनी प्रवंधन जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर गोड्डा के उपायुक्त (जिलाशासक) एवं भादोतोला गांव के ग्रामीणों के साथ कई बार बैठकें कर चुका है. परन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है.
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार राजमहल परियोजना से सालाना 17 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता है. परियोजना में जहां खनन चल रहा है, उसके बीच में भादोतोला गांव आ गया है. जब तक इस गांव को खाली नहीं कराया जायेगा, खनन के लिए परियोजना का विस्तार नहीं हो सकता है. इसलिए हर हाल में गांव को खाली करना ही होगा. उन्होंने कहा कि अगर जमीन अधिग्रहण को मामला जल्द नहीं निपटा गया तो वित्तीय वर्ष 2018 -2019 में इस परियोजना से खनन कार्य बंद करना पड़ेगा. किसी तरह मौजूदा वित्तीय वर्ष में उत्पादन किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि ललमटिया खदान में हुयी दुर्घटना के बाद से पहले से ही इस परियोजना के उत्पादन में काफी गिराबट आयी है. जहां प्रतिदिन 80 हजार टन कोयले का खनन होता था, दुर्घटना घटने के बाद से 30 हजार टन प्रतिदिन कोयले का उत्पादन हो रहा है. भादोतोला गांव से पहले ही चार सौ ग्रामीणओं को पुनर्वासित किया जा चुका है. उनके लिए कंपनी ने घर और जमीन को दाम कीमत लगा कर उसका भुगतान भी कर दिया है. पांच सौ ग्रामीण अभी भी उस गांव में रह रहे हैं. इस गांव में मुसलिम एवं संथाल रह रहे हैं.
मालूम हो कि कंपनी के आरआर पॉलिसी के तहत पहले दो एकड़ जमीन के अधिग्रहण पर एक भूमिधारक को नौकरी देने का प्रावधान था. परन्तु नये कानून बनने पर अब भूमि धारक को नौकरी नहीं, एकमुश्त मकान एवं जमीन को कीमत लगाकर मुआवजे का भुगतान किया जाता है. शिफ्टिंग के लिए कंपनी 50 हजार रु पया तथा घर बनाने के लिए 90 हजार रूपये देती है. परियोजना को पूरी क्षमता से चलाने के लिए ढ़ाई सौ हेक्टेयर जमीन की जरु रत है. दूसरे फेज में तालझाडी तथा बांसडीह दोनों मौजा को जमीन का अधिग्रहण करना होगा क्योंकि कोयला खनन उसी मौजा की दिशा में हो रहा है. अगर यह परियोजना बंद हो जायेगी तो कंपनी उत्पादन लक्ष्य का साठ फीसदी भी हासिल नहीं कर पायेगी. आशंका है कि बढ़ते घाटे के कारण कंपनी फिर से बीआइएफआर में न चला जाये.

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