कमल किशोर : दिन के करीब दो बज रहे थे. झुलसती दोपहरी में प्रभात खबर की टीम उस इलाके में मौजूद थी, जहां लोगों ने कभी उत्सव नहीं मनाया. एक साथ नहीं जुटे, इस खतरे से कि कहीं उनके देह को निशाना बना कर बंदूकें न गरजने लगे.
घोर जंगल में स्थित इन इलाकों में आज उत्सव मनाया जा रहा था, लोकतंत्र का. गुड़ाबांदा के महेशपुर स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय में अपने मताधिकार का प्रयोग करने बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे. कतारबद्ध, बिलकुल अनुशासित.
हाथ में वोटर कार्ड और पर्ची लेकर अपनी बारी का इंतजार करते लोग. चेहरे पर खौफ की जगह गर्व और मुस्कान लिये लोग. लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास झलकाते लोग. जब हमारी टीम पहुंची, तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मी पहले से और सजग हो गये, जानना चाहते थे… हम कहां से आये हैं?
इन बीहड़ों में आने का हमारा क्या उद्देश्य है? नेक इरादे और सजग पत्रकार होने के आश्वासन के बाद सुरक्षाकर्मी सामान्य हो पाये. पता चला कि इस बूथ पर हड़ियान और महेशपुर के करीब 1042 लोगों के नाम हैं.
करीब 60 फीसदी मतदान हो चुका है. कतार देख कर हमारी टीम ने सहज ही अनुमान लगा लिया कि मतदान की अवधि समाप्त होने तक वोटिंग प्रतिशत 80 प्रतिशत से ऊपर चली जायेगी.
धूप और तेज गर्मी के बाद भी करीब 200 लोग कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. पता चला, एक ही इवीएम है, इस कारण मतदान की प्रक्रिया काफी धीमी चल रही है. लोगों को अधिक देर तक कतार में खड़ा होना पड़ रहा है.
पूछने पर पता चला कि कुछ सुरक्षा कारणों से एक ही इवीएम लायी गयी है. सुरक्षाकर्मी बताते हैं, भले ही इलाका अब कुछ शांत हो गया है, पर हमलोग कोई खतरा नहीं लेना चाहते. सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किये गये हैं.
मतदान केंद्र के आसपास के पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी गयी है़ जंगलों में भी सुरक्षा बल तैनात किये गये हैं. पूछे जाने पर आगे कहते हैं, सबसे बड़ी चुनौती इवीएम को वापस ले जाने की है. इसके लिए अतिरिक्त फोर्स की व्यवस्था की जा रही है. यह वही इलाका है, जहां कभी कान्हु मुंडा का वर्चस्व था.
15 फरवरी 2017 को 25 लाख के इनामी नक्सली कान्हु मुंडा समेत छह नक्सली फोगड़ा मुंडा, भुगलू सिंह, जितेन मुंडा, शंकर मुंडा, काजल और चुनू मुंडा आदि ने आत्मसमर्पण किया था. पर इसके पहले इन इलाकों में अक्सर गोलियां और बम की आवाज सुनी जा सकती थी.
इसी इलाके में 2003 में नक्सलियों ने थाने (गुड़ाबांदा) पर हमला किया था. 2004 में इंस्पेक्टर सुनील नाग सहित चार पुलिसकर्मियों को लैंड माइन ब्लास्ट में मार दिया गया था. 2007 में पुलिस मुखबिरी का आरोप लगा कर तीन ग्रामीणों की बेरहमी से हत्या की गयी थी.
और तो और, इसी इलाके में 13 फरवरी 2010 को अपने कार्यालय में बैठे धालभूमगढ़ के बीडीओ को अगवा कर रखा गया था. लेकिन आज इन घटनाओं को कोई याद नहीं करना चाहता. बातचीत के क्रम में वोट देने पहुंची एक महिला काफी अनुरोध पर बातचीत करने को तैयार हुई.
हालांकि नाम बताने से इनकार कर दिया है. वह बताती है, समय बदल गया, अब जंगल जाने में भी डर नहीं लगता. उस पार से (ओड़िशा) भी अब ज्यादा खतरा नहीं है. उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा, वोट देने आये हैं, अब चाहे जितनी देर हो… वोट देकर ही जायेंगे.
इसके बाद हमारी टीम पहुंची काशियाबेड़ा. गुड़ाबांदा से करीब सात किमी पहले का इलाका. यहां भी एक बूथ पर महिलाओं और पुरुषों की लंबी कतार थी. पता चला सुबह से ही लोग जुटे हैं.
मतदान की प्रक्रिया धीमी है, इस कारण समय लग रहा है. मध्य विद्यालय मुचरीशोल में भी कमोबेश यही स्थिति थी. यहां जियानगुड़ा और मुचरीशोल के लोगों के लिए मतदान केंद्र बनाया गया था. हमारे पहुंचने तक 995 वोटरों में 654 ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर दिया था.
कतार में भी करीब 200 लोग मौजूद थे. यहां एक बीएलओ से पूछे जाने पर उसने बताया, 2014 के मुकाबले लोगों में वोट देने की रुचि बढ़ी है़ कारण चाहे जो भी रहा हो, पर अब लोग सजग हो रहे हैं. अपने अधिकार और कर्तव्य को जान-समझ रहे हैं. लोगों में वोट देने की ललक दिख रही है. मुचरीशोल का मतदान केंद्र भी काफी आकर्षक था़
सामने करीब 100 कदम पर नाला है, जो ओड़िशा की सीमा को विभाजित करता है. स्थानीय लोग बताते हैं, इसी 100 कदम से नक्सलियों का आना-जाना लगा रहता था. पर अब समय बदल गया है. अब इन बीहड़ों में जहां कभी बंदूकें गरजती थी, वहां लोग गर्व से अपनी अंगुली की ब्लू इंका दिखा रहे हैं.
