पेंडिंग पड़े हैं संप के 8818 मामले
दुमका : संताल परगना अलग प्रमंडल के रूप में 1983 में अस्तित्व में आया था, तब से अब तक 33 साल गुजर चुके हैं. इन 33 सालों में इस पिछड़े प्रमंडल ने 44 प्रमंडलीय आयुक्त का चेहरा देख लिया. झारखंड बनने के पंद्रह-सोलह सालों में 30. अधिकांश पदाधिकारी तो ऐसे भी रहे, जिन्हें सरकार ने यहां छह महीने के लिए भी आयुक्त बने नहीं रहने दिया. इस वजह से आयुक्त के न्यायालय में चलने वाले मुकदमों की सुनवाई नहीं हो पा रही है. तारीख पर तारीख मिल रहा है
और तीन दशक गुजर चुकने के बाद भी फैसला नहीं हो सका है. न्याय की आस में जवानी के दिनों में मुकदमा करने वालों के चेहरे पर झुर्रियां पड़ चुकी है. लाठी का सहारा लेकर मुकदमा लड़ने के लिए तारीख पर हाजिर होना पड़ता है, पर न्याय अब तक उन्हें नहीं मिल सका. कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जो भागलपुर प्रमंडल से अलग होने के बाद यहां आये थे, वह मामले आज भी निष्पादित नहीं हो सके.
