Dhanbad News: कैसेट नहीं होने से एसएनएमएमसीएच में फेको विधि से सर्जरी ठप

एसएनएमएमसीएच में मशीन दुरुस्त, फिर भी मोतियाबिंद के आधुनिक ऑपरेशन से वंचित है सैकड़ों मरीज.

शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसएनएमएमसीएच) के नेत्र रोग विभाग में आधुनिक फेको (पीएचएसीओ) मशीन वर्षों से बेकार पड़ी है. पहले यह मशीन तकनीकी खराबी के कारण बंद थी, जिसे कुछ माह पहले ठीक कराया गया. अब एक छोटी लेकिन जरूरी सामग्री, कैसेट के अभाव में यह मशीन फिर से इस मशीन का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. ऐसे में यहां सैकड़ों मरीजों को मोतियाबिंद की आधुनिक सर्जरी से वंचित होना पड़ रहा है.

क्या है फेको मशीन और क्यों है जरूरी

फेको मशीन का इस्तेमाल मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) सर्जरी में किया जाता है. यह एक अत्याधुनिक तकनीक है, जिसमें अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद से आंख के धुंधले लेंस को तोड़कर बाहर निकाला जाता है और उसकी जगह कृत्रिम लेंस लगाया जाता है. यह प्रक्रिया पारंपरिक सर्जरी की तुलना में अधिक सुरक्षित, कम समय लेने वाली और तेजी से रिकवरी देने वाली होती है.

2,500 रुपये के कैसेट के लिए मशीन का नहीं हो पा रहा इस्तेमाल

फेको मशीन में इस्तेमाल होने वाला कैसेट एक डिस्पोजेबल किट होती है, जो हर सर्जरी में जरूरी होती है. इसमें ट्यूबिंग, फ्लूइड कंट्रोल सिस्टम व अन्य जरूरी घटक शामिल होते हैं. एक कैसेट की अनुमानित कीमत 2,500 रुपये है. हर सर्जरी के लिए अलग कैसेट की जरूरत होती है, इसलिए इसकी नियमित आपूर्ति जरूरी है. सिर्फ 2,500 रुपये के कैसेट के बिना फेको मशीन का इस्तेमाल बंद है. यही सर्जरी के दौरान तरल पदार्थ के प्रवाह और सक्शन सिस्टम को नियंत्रित करता है.

कई बार अवगत कराने पर भी नहीं हो रही कार्रवाई

अस्पताल के नेत्र विभाग के एक चिकित्सक ने बताया कि कैसेट के लिए कई बार विभागीय स्तर पर प्रबंधन को जानकारी दी गयी है. अबतक ठोस पहल नहीं हुई है. यहां मशीन पूरी तरह से ठीक है, लेकिन कैसेट की नियमित आपूर्ति नहीं होने से समस्या बनी हुई है.

फेको सर्जरी से मिलने वाले लाभ

– छोटा चीरा : आंख में बहुत छोटा कट लगाया जाता है.

– कम दर्द : सर्जरी लगभग दर्दरहित होती है.

– तेजी से रिकवरी : मरीज 1-2 दिन में सामान्य जीवन में लौट सकता है.

– कम संक्रमण का खतरा : आधुनिक तकनीक होने के कारण जोखिम कम होता है.

– बेहतर दृष्टि : ऑपरेशन के तुरंत बाद दृष्टि में सुधार दिखता है.

– भर्ती होने की नहीं है जरूरत : डे-केयर सर्जरी संभव है.

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लेखक के बारे में

Published by: Ashok kumar

आशीष कुमार प्रिंट माध्यम में 16 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति व सिनेमा में रुचि रखते हैं.

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