देवघर : संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने, गर्भवती महिला को अस्पताल तक पहुंचाने व नवजात मृत्युदर में कमी लाने में ममता वाहन की बड़ी भूमिका है. लेकिन, देवघर जिले में ममता वाहन मरीजों पर ममता नहीं दिखा रहा है. जिले में ममता वाहन के लिए 77 वाहनों ने रजिस्ट्रेशन करा रखा है, परंतु मात्र 24 ममता वाहन ही सुविधाएं दे पा रहे हैं. रजिस्टर्ड वाहनों में बोलेरो, स्कॉर्पियो और मारुति वैन भी शामिल हैं.
ममता वाहन नहीं चलने का मुख्य कारण विभाग की ओर से वाहन चालक को एक तरफ का ही भाड़ा मिलना बताया जा रहा है. ममता वाहन नहीं मिल पाने के कारण कई बार गर्भवती महिलाओं को टेंपो या किराये के वाहन से लाना पड़ जाता है. निजी खर्चे पर परिजनों से मनमाना किराया वसूला जाता है. अनदेखी व आपसी खींचतान के कारण यह योजना खटाई में पड़ गयी है.
मिलीभगत से चल रहा बड़ा खेल : जिला में ममता वाहन के संचालक, कॉल सेंटर और अस्पताल में कार्यरत कर्मियों की मिलीभगत से मरीजों को रेफर करने का भी खेल चल रहा है. एक व्यक्ति के अलग-अलग नामों से तीन वाहन पंजीकृत हैं. कॉल सेंटर से कॉल आने पर सिर्फ मारुति वैन ही भेजते हैं. इसके अलावा इन सभी वाहनों का जिला निबंधन कार्यालय से प्राइवेट वाहन के लिए भी निबंधन हुआ है.
ममता वाहन की अधिकतर गाड़ियों में ममता वाहन ही नहीं लिखा हुआ है. जिस कारण पता ही नहीं चलता कि वह ममता वाहन है या नहीं. नियम के अनुसार, सभी ममता वाहन में स्पष्ट अक्षरों में यह लिखा होना है अथवा स्टिकर चिपका होना चाहिए.
कॉल सेंटर दो व्यक्ति के भरोसे
देवघर सदर अस्पताल से संचालित ममता वाहन का कॉल सेंटर मात्र दो कर्मी कार्यरत हैं. अगर किसी दिन एक कर्मी या फिर जरूरत में दोनों कर्मी छुट्टी पर चले गये तो कॉल सेंटर बंद हो जाता है. कर्मियों की कमी के कारण कॉल सेंटर 24 घंटा संचालित नहीं हो पाता है. वर्तमान में कॉल सेंटर सुबह छह से रात दस बजे तक ही संचालित हो रहा है. जिसमें दो कर्मियों को आठ-आठ घंटे की ड्यूटी पर लगाया गया है.
