गोइलकेरा/मनोहरपुर. पश्चिमी सिंहभूम जिले के जंगलों में कभी समानांतर सत्ता चलाने वाला माओवादी संगठन वर्तमान में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. सुरक्षाबलों की निरंतर और योजनाबद्ध कार्रवाई ने नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया है. ऐसे में मुख्यधारा में लौट चुके रमेश चांपिया की हत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. जानकारों का मानना है कि नक्सली संगठन से दूर होकर सामान्य जीवन जी रहे लोगों या सुरक्षा बलों की मदद करने वालों में खौफ पैदा करने के लिए संभवत: यह हत्या की गयी हो. चूंकि रमेश सड़क निर्माण परियोजना में मुंशी का काम कर रहा था, इसलिए विकास कार्यों को बाधित करना भी नक्सलियों का एक उद्देश्य हो सकता है.
नक्सलियों का रणनीतिक ””अल्टी-पलटी”” मार्ग है दुगुनिया गांव
दुगुनिया गांव में पूर्व नक्सली रमेश चांपिया की हत्या ने क्षेत्र के रणनीतिक महत्व को फिर से उजागर किया है. भौगोलिक दृष्टि से दुगुनिया गांव, गोइलकेरा की गम्हरिया पंचायत और मनोहरपुर के छोटा नागरा क्षेत्र के बीच स्थित है. माओवादी दस्ते पुलिसिया कार्रवाई से बचने के लिए इसी मार्ग का उपयोग ””””अल्टी-पलटी”””” (एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में सुरक्षित पलायन) के लिए करते रहे हैं. स्थानीय सूत्रों का दावा है कि इस गांव के दो सदस्य अब भी संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर सक्रिय हैं, जिससे यह इलाका नक्सलियों के लिए एक सुरक्षित गलियारे के रूप में काम करता है.21 किमी के क्षेत्र में सिमटे नक्सली वजूद बचाने में जुटे
जो संगठन कभी पूरे सारंडा रिजर्व फॉरेस्ट में जमा था, वह अब महज 21 किलोमीटर के संकरे इलाके में सिमट कर रह गया है. रसद (अनाज) की कमी, टूटता नेटवर्क और अपनों का साथ छूटने के कारण अब नक्सली सॉफ्ट टारगेट को निशाना बनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं.मिसिर बेसरा पर बढ़ा शिकंजा, आत्मसमर्पण का दबाव
भाकपा माओवादी संगठन का पोलित ब्यूरो सदस्य सह एक करोड़ रुपये का इनामी कमांडर मिसिर बेसरा इस समय सुरक्षा एजेंसियों के सबसे बड़े निशाने पर है. सूत्रों के अनुसार, उसके दस्ते में मेहनत उर्फ मोछू, सागेन अंगारिया और अश्विन सहित करीब 53 नक्सली शामिल हैं. हालांकि, अब यह दस्ता छोटे-छोटे समूहों में बंटकर राधापोरा, बालिबा और बाबूडेरा की पहाड़ियों में छिपने को विवश है. सुरक्षा बल अब सामरिक दबाव के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहे हैं. मिसिर बेसरा के बेटे और भाई के माध्यम से उसे आत्मसमर्पण के लिए संदेश भेजे जा रहे हैं, ताकि वह मुख्यधारा में लौट सके.
ग्रामीणों का घटता समर्थन व सुरक्षा बलों के बढ़ते प्रभाव से बैकफुट पर नक्सली
एक समय नक्सली संगठन लेवी के रूप में करोड़ों रुपये और प्रचुर मात्रा में रसद जुटाते थे, लेकिन आज स्थिति उलट है. सुरक्षाबलों की सख्त निगरानी के कारण नक्सलियों तक पहुंचने वाली रसद की सप्लाई चेन टूट चुकी है. हाल में नक्सली दस्ते गांवों में जाकर ग्रामीणों से भोजन के लिए चावल और अनाज की मांग कर रहे हैं. ग्रामीणों का घटता समर्थन और सुरक्षा बलों के बढ़ते प्रभाव ने नक्सलियों को भूख और डर के साये में जीने पर मजबूर कर दिया है.अंतिम समय में और हिंसक हो रहे नक्सली
सारंडा में माओवाद अब अपने अंतिम चरण में है. संसाधनों का अभाव और बढ़ता सैन्य दबाव नक्सलियों के अंत की पटकथा लिख रहा है. हालांकि, हाल के आइइडी विस्फोट और हमले यह बताते हैं कि अंतिम समय में नक्सली और अधिक हिंसक हो सकते हैं. पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां फिलहाल जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही हैं, ताकि जल्द ही कोल्हान और सारंडा को पूरी तरह नक्सल मुक्त घोषित किया जा सके.सुरक्षा बलों ने किलेबंदी की रणनीति बनायी
– पुलिस प्रशासन ने नक्सलियों को जड़ से मिटाने के लिए अभेद्य किलेबंदी की है. इसके तहत सायतवा, बोरोई, आराहासा, सेरेंगदा, लोढ़ाई, बुरु गोइलकेरा और कादलकोचा जैसे अति संवेदनशील क्षेत्रों में सीआरपीएफ कैंप स्थापित किये गये हैं.– वहीं, सुरक्षा व्यवस्था को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए कुइड़ा और सेरेंगदा में नये थानों ने काम करना शुरू कर दिया है. कोबरा, झारखंड जगुआर, सीआरपीएफ और जिला पुलिस की संयुक्त टीमें हर पहाड़ी और घाटी की सघन तलाशी ले रही हैं.
