बोकारो की पहचान देश में इस्पात नगरी के रूप में है. लेकिन, इसी बोकारो इस्पात शहर की परछाई के नीचे 19 गांव ऐसे हैं, जो अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इन गांवों की आबादी लगभग 80 हजार है. गांव वालों की विवशता इससे समझा जा सकता है कि सरकार तो बना सकते हैं, लेकिन अपने लिए जन्म प्रमाण पत्र समेत बुनियादी सरकारी सुविधाएं प्राप्त नहीं कर सकते हैं. इन गांवों को त्रि-स्तरीय पंचायती व्यवस्था के तहत किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है. ये गांव वर्ष 1956 से अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं. कारण है कि ये गांव ना पंचायत में शामिल है, ना ही नगर प्राधिकार में.
वर्ष 1956 तक ये सभी गांव पंचायत में शामिल थे. लेकिन, बोकारो इस्पात संयंत्र के निर्माण नोटिफिकेशन के बाद से अपनी सरकारी पहचान के लिए संघर्ष रहे हैं. अधिग्रहित चार दर्जन गांव व पुनर्वासित गांवों को साल 1991 के सर्वे के अनुसार पंचायत का दर्जा मिल गया, लेकिन इन गांवों की किस्मत की हर बार कोई ना कोई रोड़ा अटक ही जा रहा है. कभी साइंस सिटी के नाम पर तो कभी कुछ अन्य योजना के नाम पर इन गांवों की पहचान स्थापित नहीं हो पा रही है. शिबुटांड़, कुंडौरी, मोहनपुर, आगरडीह, करमाटांड़, बांसगढ़, पंचौरा, महेशपुर, कनफट्टा, कंचनपुर, बास्तेजी, बैदमारा, धनघड़ी, महुआर, मोदीडीह, चिटाही, चैताटांड़ आदि को पंचायत में शामिल करने के लिए लोग लड़ाई लड़ रहे हैं. उपरोक्त गांव के लोग इन गांव व अन्य छोटे-छोटे गांव को लेकर पंचायत बनाने की मांग कर रहे हैं. 1986 से अधिग्रहित व पुनर्वासित गांवों (कुल 80 गांव) को पंचायत में शामिल करने की लड़ाई शुरू हुई थी. 23 मार्च 2002 को तत्कालीन बोकारो डीसी विमल कृति सिंह के हस्ताक्षर से बीएसएल के अधिग्रहित गांवों के लिए 14 पंचायतों के गठन के लिए अधिसूचना जारी की गयी थी. इसके बाद बाद के डीसी सत्येंद्र सिंह ने कनारी उत्तरी पंचायत का अधिसूचना जारी हुई थी. लेकिन, उत्तरी क्षेत्र के विस्थापित गांव को इसमें जगह नहीं मिली थी. दरअसल, पूर्व के नेताओं ने साइंस सिटी बनाने की बात कर तत्कालीन डीसी को बरगलाया था.विस्थापित बताते हैं कि हमारी लड़ाई लंबे अरसे से चल रही है. हमारी जमीन अधिग्रहित कर ली गयी, लेकिन हमें पहचान नहीं मिली है. सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिलता. पहले बीएसएल की ओर से हमें ठगा गया. यहां तक की समुचित मुआवजा भी नहीं मिला. अब पंचायत में शामिल होने की लड़ाई लड़ रहे हैं. झारखंड अलग होने के बाद लगा था कि समस्या का हल हो गया, लेकिन अब तक स्थिति जस की तस है.
विधानसभा में कई बार उठ चुका है मामला
उत्तरी क्षेत्र के विस्थापित गांव को पंचायत में शामिल करने की मांग सड़क से सदन तक पहुंची है. विस्थापित संगठन की ओर से सैकड़ों बार प्रदर्शन किये गये. अधिकारी व जनप्रतिनिधि से पत्राचार किया गया. विधानसभा में भी मामला कई बार उठा है. पूर्व विधायक स्व अकलूराम महतो, स्व समरेश सिंह, बिरंची नारायण समेत वर्तमान विधायक श्वेता सिंह इस मसले को लेकर सदन में सवाल उठाया है. विभागीय मंत्री व अधिकारी के साथ दर्जनों बार बैठक हुई है. लेकिन परिणाम कुछ नहीं मिला. जिला प्रशासन के साथ जनप्रतिनिधि व विस्थापितों की हजारों बार बैठक हुई. हर बार सकारात्मक पहल की बात कही जाती है. कितनी सरकार आयी और गयी. हर सरकार के पास विस्थापित गुहार लगाते रहे हैं. विस्थापन आयोग के गठन को लेकर कई बार दावा होता है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कैबिनेट ने सितंबर 2025 में इस आयोग के गठन और इससे संबंधित नियमावली 2025 को मंजूरी भी दी. लेकिन, अभी तक इन गांवों के दर्द पर सरकार का मरहम नहीं लगा है.
कैसे आयी इन गांवों में ये बदनसीबी
1960 के दशक में बोकारो स्टील प्लांट स्थापित किया गया था. निर्माण शुरू होने से पहले सरकार ने वर्ष 1956 में ही भूमि अधिग्रहण का नोटिस जारी किया. लगभग 15,685 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की गयी. वर्ष 1968 में तत्कालीन बिहार सरकार के मुख्य सचिव अरूप कुमार बसु ने बीएसएल के पास सरप्लस जमीन होने की बात कही. 2,954 हेक्टेयर सरप्लस जमीन की बात हुई. मुख्य सचिव ने कहा था कि राजस्व गांव की भूमि के बेकार अधिग्रहण से खेती व अन्य कार्य नहीं हो रहा है. इससे राजस्व का नुकसान हो रहा है. इन जमीन को ग्रामीण को वापस कर दिया जाये, लेकिन बीएसएल ने विस्तारीकरण के नाम पर जमीन वापस नहीं किया.
हजारों याचिकाएं, गिरफ्तारियां और धरना, सब फेल
वर्ष 2011 में झारखंड हाईकोर्ट ने 18 गांवों के 10,312 निवेदकों को करीब 300 करोड़ का मुआवजा देने का ऑर्डर दिया था. उस वक्त सात दिन की एक प्रक्रिया के तहत विस्थापित लोगों की पहचान होनी थी. बिहार के पूर्व मंत्री स्व अकलूराम महतो इन विस्थापितों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए निदेशक, परियोजना और भूमि पुनर्वास (डीपीएलआर) में 42,000 याचिकाएं दायर की थी. 1982 में स्व विनोद बिहारी महतो मुआवजा के मामला को लेकर कोर्ट गये. कई लोगों को मुआवजा की राशि मिली, लेकिन कई मामले वर्तमान में भी कोर्ट में ही चल रहे हैं. इसके अलावा विस्थापितों ने नियोजन, पुनर्वास व मुआवजा को लेकर हजारों बार प्रदर्शन किया. कई बार आंदोलन उग्र भी हुआ है. गिरफ्तारियां हुई. अनिश्चितकालीन धरना दिया गया है. लेकिन, ग्रामीणों को न्याय नहीं मिल पाया है.
विधानसभा की कमेटी ने माना था कि हजारों विस्थापितों को नहीं मिला नियोजन
2012 के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में विस्थापित मामले की पड़ताल करने के लिए विधानसभा की विशेष जांच समिति गठित की गयी थी. इसमें माधवलाल सिंह, उमाकांत रजक, जगरनाथ महतो (अब स्वर्गीय), अमित कुमार यादव, ढुल्लू महतो थे. रिपोर्ट 30 नवंबर 2012 को विधानसभा में प्रस्तुत की. इसमें कहा कि निदेशक, परियोजना भूमि एवं पुनर्वास ने कुल 23,947 विस्थापित परिवार चिन्हित किये हैं. इसमें 15,890 व्यक्तियों को बोकारो प्लांट में नियोजित किया गया है, जिसमें 12,600 परिवार अच्छादित होते हैं. अभी भी कुल 11,357 विस्थापितों को नियोजन देना बाकी है.
एक विवाद का कारण यह भी
बोकारो इस्पात कारखाने की स्थापना के समय प्रथम प्रबंध निदेशक केएम जॉर्ज ने विस्थापितों के नाम पर एक हैंडबिल जारी कर वादा किया था कि प्लांट निर्माण में अपनी जमीन दिजिये, चतुर्थ श्रेणी की नौकरी आपके लिए सुरक्षित व आरक्षित रहेगी. लोगों ने घर-बारी, खेत-खलिहान बोकारो इस्पात कारखाने के निर्माण के लिए दी. लेकिन, बाद में इस वादा से प्रबंधन मुकर गया. पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी के बोकारो आगमन के दौरान संज्ञान में मामला आने पर विस्थापितों का नियोजन फिर से शुरू हुआ था. बीच में सेना से सेवानिवृत्त हो चुके लोगों के लिए चतुर्थ श्रेणी की बहाली बीएसएल प्रबंधन ने निकाली. लेकिन बिहार सरकार ने इस पर रोक लगाने का आदेश जारी करते हुए कहा कि चतुर्थ श्रेणी की नौकरी सिर्फ विस्थापितों के लिए आरक्षित है.
मंत्री दीपिका पांडेय सिंह के साथ हुई थी उच्च स्तरीय बैठक
इसी साल 16 मार्च को झारखंड विधानसभा सत्र के दौरान विस्थापित गांवों को पंचायती राज व्यवस्था में शामिल करने का को लेकर पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की अध्यक्षता में बैठक हुई. बैठक में बोकारो विधायक श्वेता सिंह, चंदनकियारी विधायक उमाकांत रजक, निरसा विधायक अरूप चटर्जी, पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार, भू-राजस्व विभाग के सचिव चंद्रशेखर, पंचायती राज निदेशक बी राजेश्वरी व बोकारो डीसी अजय नाथ झा शामिल रहे.
विस्थापित गांवों को पंचायती राज व्यवस्था से जोड़ने से संबंधित प्रशासनिक व विधिक पहलू पर चर्चा हुई थी.