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दिल्ली में कैसे बढ़ी झुग्गियां, कैसे बचती रहीं, समझें इसके पीछे की पूरी राजनीति

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
दिल्ली की झुग्गियां
दिल्ली की झुग्गियां
फाइल फोटो

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में झुग्गियों को लेकर राजनीति तेज है. इन झुग्गियों के बसने, इनकी संख्या बढ़ने के पीछे भी राजनीति है. इन झुग्गियों की राजनीति को समझने के लिए इसके पीछे के खेल को भी समझना जरूरी है. झुग्गियों का पूरा खेल समझने से पहले ताजा स्थिति समझिये..

राजधानी दिल्ली में रेलवे ट्रैक किनारे बसी झुग्गियों को हटाने का आदेश कोर्ट ने दिया है. दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी पार्टी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने नोटिस जारी किया है कि इस महीने के दिल्ली की झुग्गी बस्तियां हटा दी जाएंगी.

भारतीय जनता पार्टी ने झुग्गियों को हटाने से पहले अरविंद केजरीवाल से इनके रहने की व्यवस्था करने की अपील की है. अब आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा ने एक प्रेस वार्ता में कहा, ‘‘जब तक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जीवित हैं, तब तक दिल्ली में किसी भी झुग्गी में रहने वाले को विस्थापित नहीं किया जाएगा.

अब झुग्गियों का वोटबैंक और राजनीति समझिये

झुग्गी में रहने वालों के वोटबैंक का महत्व राजनीतिक पार्टियां खूब समझती हैं. यही कारण है कि राजनीतिक पार्टियां यहां रहने वालों की मदद करती है. यहां रहने वालों का राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र जैसे सरकारी दस्तावेज बनाने में इनकी मदद करती है. झुग्गी में रहने वाले इससे खुश रहते हैं और मदद करने वाले राजनीतिक दल का साथ भी देते हैं.

ज्यादा पीछे नहीं अगर आप चार साल पीछे जायेंगे तो आपको याद आयेगा शकूरबस्ती में रेलवे ट्रैक के किनारे जब अतिक्रमण हटाने का फैसला लिया गया था तो राजनीतिक दल इसके विरोध में सड़क पर उतर गये थे. आज की राजनीतिक परिस्थिति भी देखिये कि कैसे झुग्गी हटाने के कोर्ट के फैसले के बावजूद राजनीतिक दल इन इलाकों में रहने वालों के साथ खड़े हैं.

कैसे बचती रही है झुग्गियां

यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने झुग्गियों को हटाने का फैसला लिया है. इससे पहले भी कोर्ट ने इन्हें हटाने का फैसला दिया है लेकिन कोर्ट के फैसले के बावजूद कोई ना कोई कारण बताकर स्टे ले लिया गया. एक बड़ा कारण है झुग्गी में रहने वालों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था करना. इन्हें बेघर करके झुग्गियां नहीं तोड़ी जा सकती.

कई बार इस आधार पर ही स्टे मिलता रहा है. पहले एक झुग्गी को हटाने पर पुनर्वास के लिए 80 हजार रुपये देना होता था अब राज्य सरकार ने इस पर फैसला लेकर 20 लाख रुपये कर दिया है. अंदाजा लगा लीजिए लगभग 48 हजार झुग्गियों को हटाने का फैसला लिया गया है. ऐसे में कितने पैसे की जरूरत होगी.

झुग्गियों के पीछे पनपता अपराध

रेलवे ट्रैक के किनारे बनी झुग्गियो में अपराध भी पनपता है यह हम नहीं कह रहे पुलिस सूत्रों की मानें तो झुग्गियां जिन जगहों पर बनी होती है ट्रेन को अपनी रफ्तार कम करनी पड़ती है. रफ्तार कम होने के बाद अपराधी आसानी से अपराध को अंजाम दे देते हैं. अपराध करने के बाद ये झुग्गियां उनके छिपने का ठिकाना बन जाता है. पुलिस सूत्रों की माने तो अवैध बस्तियों में तमाम काले कारोबार भी पनपते हैं. अन्य इलाकों से अपराध की तुलना करें, तो यहां अपराध ज्यादा होता है.

कैसे बढ़ती चली गयी झुग्गियां

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 48 हजार झुग्गियों को हटाने का आदेश दिया है. दिल्ली में प्रमुख रूप से मंडावली, विवेक विहार, आनंद विहार, ओखला, निजामुद्दीन, सरोजनी नगर, शिवाजी ब्रिज, तिलक ब्रिज, शकूरबस्ती, इंद्रपुरी, नारायणा, सराय रोहिल्ला, सब्जी मंडी, दया बस्ती और आजादपुर में रेलवे लाइन के किनारे झुग्गियां बसी हैं.

यह समस्या 30 साल से बनी हुई है. भूमाफियाओं ने पहले झुग्गियां बनायी इसे किराये पर लगाया और धीरे- धीरे झुग्गियों की संख्या बढ़ती चली गयी. कई जगहों पर रात भर में नयी झुग्गी बनकर तैयार हो जाती है. ऐसा नहीं है कि कोर्ट के आदेश के बाद इस पर रोक लग गयी अभी भी झुग्गियां बन रही है.

Posted By - Pankaj Kumar Pathak

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