बुद्ध कुटीर में स्थापित पीस बेल शांति का है प्रतीक, चार टन वजनी है पीस बेल सात बार बजाती है घंटी

वैशाली : वैसे तो वैशाली के कण-कण में ऐतिहासिक पलों की यादें छिपी हैं, पग-पग पर ऐतिहासिक क्षणों के साक्षी के प्रतीक चिह्न स्थापित हैं जो पर्यटकों काे अपनी ओर खिंचती हैं. इन सबसे अलग हट कर यहां स्थापित पीस बेल (शांति घंटी) का आकर्षण कुछ ऐसा है कि यहां आने वाले देसी-विदेशी सैलानी इसकी […]

वैशाली : वैसे तो वैशाली के कण-कण में ऐतिहासिक पलों की यादें छिपी हैं, पग-पग पर ऐतिहासिक क्षणों के साक्षी के प्रतीक चिह्न स्थापित हैं जो पर्यटकों काे अपनी ओर खिंचती हैं. इन सबसे अलग हट कर यहां स्थापित पीस बेल (शांति घंटी) का आकर्षण कुछ ऐसा है कि यहां आने वाले देसी-विदेशी सैलानी इसकी ओर खींचे चले आते हैं.

ऐतिहासिक अभिषेक पुष्करिणी की उत्तरी छोड़ एवं रैलिक स्तूपा से सटे बुद्ध कुटीर में स्थापित इस पीस बेल को बजाकर और इसके समीप बैठ कर वैशाली भ्रमण पर आने वाले पर्यटक विश्व में शांति और अमन-चैन की दुआ करते हैं अमेरिका के कैलिफोर्निया निवासी यंग मो ने निगमना तिब्बत मेडिटेशन सेंटर द्वारा दी गयी इस पीस बेल को 10 मई, 2008 को तत्कालीन विधानसभा स्पीकर उदय नारायण चौधरी ने स्थापित कराया था.
जर्मनी निर्मित अष्टधातु की बनी इस पीस बेल की वजन चार टन है. इसकी अनुमानित लागत एक करोड़ है. इसकी देखभाल कर रहे श्रीकांत सिंह बताते हैं इस पीस बेल की आवाज शांति का प्रतीक है. इस पीस बेल को प्रतिदिन सुबह 6 बजे एवं शाम 6 बजे सात बार बजाया जाता है.
ऐसा कहा जाता है कि इसकी आवाज जहां तक सुनाई पड़ती है वहां के लोगों के समक्ष कोई विघ्न और बाधा नहीं आती है. इस घंटे की आवाज सुनने के लिए लोग सुबह-शाम इंतजार में रहते हैं. वहीं वैशाली भ्रमण पर आने वाले विदेशी पर्यटकों के साथ-साथ वैशाली भ्रमण पर आने वाले स्कूली बच्चे के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र है. सभी इस पीस बेल की तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर यहां की यादों को सहेज कर अपने साथ ले जाते हैं.
डॉ रामनरेश राय विभागाध्यक्ष प्राकृत एवं जैन शास्त्र एबीएस कॉलेज लालगंज कहते हैं कि वैशाली भ्रमण पर आने वाले पर्यटकों के लिए यह पीस बेल आकर्षण का केंद्र है. वैशाली अपने ऐतिहासिक स्वरूप को पाने को लालायित है. अगर इसी तरह पर्यटकों को आकर्षित करने को ले निर्माण कार्य होता रहे तो वैशाली आने वाले सैलानियों के लिये एक रमणीय स्थल हो जायेगा.

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