सुपौल : जिले भर में घर के आगे-पीछे जो खाली जमीन होती है लोग उसका भी बखूबी उपयोग करते हैं. लोग उसमें सब्जी उगा लेते हैं और ऐसे ही सब्जियों के छोटे-बड़े बगीचे को हम कहते हैं बाड़ी. कुछ ऐसी ही स्थिति जिले में आंगनबाड़ियों की है. आंगनबाड़ियों में पोषण की नहीं बल्कि वास्तव में भ्रष्टाचार की सब्जी की खेती खुले आम हो रही है. ताल ठोंक कर हो रही है. मालूम हो कि जिले में दशकों पूर्व यह आईसीडीएस (इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस स्कीम) योजना शुरू की गई. लेकिन अब तक आम जनों की समझ में ही नहीं आया कि योजना को चलाने वाले पदाधिकारी-कर्मी धूर्त हैं या फिर सरकार ही अंधी है? इस योजना के अंतर्गत कहीं कोई काम ही नहीं हो रहा. पूरी की पूरी राशि संबंधितों के जेब में जा रहा है. अब यह तो जांच का विषय बना हुआ है कि किसकी जेब में कितना माल जाता है.
आंगनबाड़ी केंद्रों में नहीं है संसाधन, कैसे हो समाधान
सुपौल : जिले भर में घर के आगे-पीछे जो खाली जमीन होती है लोग उसका भी बखूबी उपयोग करते हैं. लोग उसमें सब्जी उगा लेते हैं और ऐसे ही सब्जियों के छोटे-बड़े बगीचे को हम कहते हैं बाड़ी. कुछ ऐसी ही स्थिति जिले में आंगनबाड़ियों की है. आंगनबाड़ियों में पोषण की नहीं बल्कि वास्तव में […]

विभाग कर रही दावा, लेकिन ये है जमीनी हकीकत : जिला समाज कल्याण विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक समग्र बाल विकास सेवा (आइसीडीएस) योजना के तहत जिले में कुल 1983 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित किए गये हैं. जहां अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र अपने लक्ष्य और दायित्व से कोसों दूर हैं. मुश्किल से 60 फीसदी बच्चों को नियमित पोषाहार मिल पा रहा है. आइसीडीएस का पहला लक्ष्य ही बच्चों को कुपोषण से बचाना है. लेकिन कागजों में दर्ज बच्चों में बमुश्किल 60 फीसदी को ही आंगनबाड़ी केंद्रों पर नियमित पोषाहार मिलता है. समाज कल्याण विभाग के संबंधित अधिकारी के मुताबिक हर आंगनबाड़ी केंद्र में आने वाले बच्चे रोजाना दोपहर डेढ़ सौ से दो सौ ग्राम खिचड़ी, अंडे, हलवा या पुलाव खाते हैं. सुबह के नाश्ते में इन्हें फल और बिस्किट मिलता है.
लेकिन हकीकत में तो अधिकांश केंद्रों पर बच्चों की मौजूदा संख्या के अनुरूप भोजन पकाने की सुविधा तक उपलब्ध नहीं है. कई जगहों पर विटामिन ए की खुराक तक समय पर नहीं मिल पा रही है. कहीं-कहीं जरूर कभी-कभी बच्चों को कुछेक बिस्कुट या टॉफियां देकर समझ लिया जाता है कि अब वे कुपोषित नहीं रह गए हैं.
अधिकांश केंद्र संसाधन की अभाव से जूझ रहा : आलम यह है कि आंगनबाड़ी सेविका के बीमार पड़ने, प्रशिक्षण पर जाने या किसी अन्य काम से जाने पर ये केंद्र नहीं खुल पाते. अधिकांश आंगनबाड़ियों में वजन मापने की मशीन उपलब्ध नहीं है. साथ ही जहां उक्त मशीन उपलब्ध भी है. ऐसे केंद्रों पर उसका कभी उपयोग नहीं किया जाता. अधिकांश केंद्रों पर दवा की किट, बच्चों का शारीरिक विकास दर्ज करने की व्यवस्था, शौचालय और स्वच्छ पानी आदि की व्यवस्था तो कहीं दिख ही नहीं रही. आंगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों को दरी और स्लेट तक नहीं मिलती. ज्यादातर सेविकाओं को टीकाकरण और पोषण संबंधी सामान्य सावधानियों की जानकारी नहीं है. बच्चों को खिचड़ी,
हलवा या पुलाव देने में भी सफाई नहीं बरती जाती. अधिकांश आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि पोषाहार के सामान से लेकर जलावन तक के लिए मिलने वाली रकम बेहद कम है. शिकायत करने पर संबंधित अधिकारी झिड़क देते हैं. सवाल उठता है कि फिर इस योजना का पैसा जाता कहां है? ऐसा कौन-सा स्पंज है जो योजना की राशि को सोख जाता है? सवाल यह भी उठता है कि सरकार कब तक सब कुछ जानते-बूझते हुए भी इसी तरह जनता के टैक्स से आए पैसे को गड्ढ़े में बहाती रहेगी? आखिर कब इस भ्रष्टाचार की बाड़ी को समाप्त किया जाएगा या इसमें सुधार किया जाएगा? आंकड़े व समाचार-पत्र गवाह हैं कि बिहार में जितने भी अधिकारी घूस लेते रंगे हाथों पकड़े गए हैं. उनमें बड़ी संख्या इस योजना से जुड़े अधिकारियों की रही है. फिर भी केंद्र और राज्य की सरकार क्यों इस योजना की ओवरहॉलिंग नहीं कर रही?
विभागीय जानकारी के मुताबिक जिले में कुल 1983 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है. जिसमें 133 मिनी आंगनबाड़ी भी शामिल है. वहीं कतिपय कारणों से फिलवक्त 108 केंद्र बंद पड़ा हुआ है. लेकिन विभागीय उदासीनता के कारण महज 331 आंगनबाड़ी केंद्र को अपना भवन उपलब्ध है. साथ ही 267 केंद्र भवन का निर्माण कार्य कराया जा रहा है. इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले में इस योजना के शुभारंभ को एक दशक से अधिक समय हो चुका है. लेकिन जिले भर की आंगनबाड़ी व्यवस्था समुचित तरीके से पटरी पर नहीं लौट पायी है. जबकि सरकार द्वारा इस योजना के सफल संचालन को लेकर डीपीओ, सीडीपीओ, पर्यवेक्षिका को दायित्व दिया गया. साथ ही व्यवस्था को बेहतर बनाने हेतु वर्ष 2014 में आंगनबाड़ी केंद्रों की समुचित पर्यवेक्षण के लिए उद्दीपिका पद का सृजन तीन वर्षों के लिए किया गया. बावजूद इसके यह योजना सफल नहीं हो पाया. हर जगह से तरह-तरह की शिकायतें मिल रही हैं जिससे कार्यों को सुचारु रूप से संचालन नहीं हो पा रहा है. वर्तमान समय में उद्दीपिका पद को समाप्त किये जाने के बाद व्यवस्था को बदतर बनाने में सीडीपीओ व पर्यवेक्षिका की मनमानी चरम पर देखी जा रही है.
बोले डीपीओ आइसीडीएस
आंगनबाड़ी निर्माण कार्य ग्रामीण विकास विभाग द्वारा कराया जायेगा. जिन स्थानों पर भवन अधूरा पड़ा हुआ है. उसे पूर्ण कराये जाने की दिशा में प्रयास जारी है. बच्चों को मीनू अनुरूप भोजन परोसे जाने के मामले पर जिला स्तरीय टीम द्वारा जांच की प्रक्रिया प्रारंभ करायी जा रही है. ताकि व्यवस्था में अपेक्षित सुधार हो सके.
अरुण कुमार, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी आईसीडीएस
क्या है प्रावधान
सरकारी प्रावधान अनुसार प्रत्येक केंद्र पर समाज के 28 कुपोषित, 12 अतिकुपोषित सहित आठ – आठ गर्भवती व धातृ महिलाओं को योजना का समुचित लाभ उपलब्ध कराया जाना है. साथ ही 40 कुपोषित व अतिकुपोषित बच्चों को स्कूल पूर्व शिक्षा उपलब्ध कराये जाने के साथ – साथ प्रतिदिन मीनू अनुरूप भोजन व नाश्ता परोसे जाने का भी प्रावधान है. वहीं आठ – आठ गर्भवती व धातृ महिलाओं को प्रत्येक माह के 15 वीं या फिर विशेष परिस्थिति में 22वीं तिथि को टेक होम राशन उपलब्ध कराया जाना है. लेकिन विभागीय मनमरजी के कारण जहां बच्चों को मीनू अनुरूप भोजन नहीं खिलाया जा रहा. वहीं गर्भवती व धातृ महिलाओं को मानक अनुरूप टीएचआर भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है.