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बौद्ध सर्किट से नहीं जुड़ पायी मल्ल जनपद की राजधानी पावा, लोगों को अब नये मंत्री से आस, जानिये क्या है पावा का पुरातत्वविक महत्व

By Prabhat Khabar Print Desk
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पपौर के महदेइया टीले के खुदाई का शुभारंभ करते एएसआइ के पीके मिश्रा (फाइल फोटो).
पपौर के महदेइया टीले के खुदाई का शुभारंभ करते एएसआइ के पीके मिश्रा (फाइल फोटो).
प्रभात खबर

अमरनाथ शर्मा, सीवान. जिला मुख्यालय से करीब पांच किलो मीटर पूर्व स्थित पचरुखी प्रखंड का प्राचीन बौद्ध कालीन मल्ल जनपद की राजधानी पावा(पपौर) बौद्ध सर्किट से अभी तक नहीं जुड़ पाया है.

सीवान जिले के बीजेपी नेता मंगल पांडेय को स्वास्थ्य व पथ निर्माण विभाग के साथ कला संस्कृति विभाग का दायित्व मिलने के बाद जिले के लोगों में यह आस जगी है कि भगवान गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़े प्राचीन पावा बौद्ध सर्किट से जुट जायेगा.

ऐतिहासिक तथ्यों, किदवंतियों व समय-समय पर मिले ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि भगवान गौतम बुद्ध ने अपने निर्वाण प्राप्ति के पूर्वाद्ध में यहां पर काफी समय व्यतीत किया था. सर्व प्रथम डॉ होय नामक अंग्रेज विद्धान ने पावा की खोज की थी.

उन्होंने यहां पर तांबे के कुछ इंडों बैक्ट्रियन सिक्कों को भी खोजा था. क्लेश होने के बाद भगवान बुद्ध कुशीनगर की ओर रवाना हुए, जहां उन्हें निर्वाण प्राप्त होने की बात कही जाती है. पपौर गांव के बगल में मटुक छपरा गांव है जो भग्नावशेषों पर बसा है.

1978 में ग्रामीणों ने स्वयं खुदाई कर यहां से पाल कालीन तारा व विष्णु के अतिरिक्त कई देवी-देवताओं की प्रचीन मूर्तियां निकाली थी.

महादेइया के टीले की खुदाई में मिले हैं प्राचीन अवशेष

पावा उन्नयन ग्राम समिति के संयोजक कुशेश्वर नाथ तिवारी का प्रयास 2015 में रंग लाया और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने ने पावा में खुदाई करने का फैसला किया. 23 जुलाई को भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद पीके मिश्रा ने भूमि पूजन के बाद खुदाई का काम शुरू कराया.

करीब एक माह तक हुई खुदाई में भारतीय पुरातत्व विभाग को कई प्राचीन मृदभांड, ईंट, मिट्टी के खिलौने तथा साधु-संतों के गले में पहनने वाली मिट्टी की बनी कंठी मिली. खुदाई में करीब आठ फीट लंबा तिउर(चुल्हा) मिला.

वहीं इतिहासकार जगदीश्वर पांडेय ने अपनी पुस्तक बुद्ध की यात्रा पथ की खोज में लिखा है कि पपौर(पावा) से चलकर बुद्ध कुकुत्था नदी पारकर आगे बढ़े और वर्तमान जीरादेई स्टेशन के पास सोना नदी को पार कर सीवान पहुंचे.

यहीं पर उन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया. यहां से उनके मृत शरीर को कुशीनगर ले जाया गया जहां दाह-संस्कार किया गया. सवान संस्कृत शवयान का बिगड़ा रूप है. अत: सवान(सीवान) ही बुद्ध का निर्वाण स्थल है.

सीवान रेलवे स्टेशन के निकट उतर में एक बहुत पुराना पीपल का पेड़ एक बहुत बड़े स्तूप पर है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा के दौरान 12 स्थानों व स्तुपों को देखा था. सम्राट अशोक ने कुशीनगर में तीन स्तुपों व दो स्तंभों को बनवाया था. जिसे सांतवीं शताब्दी में ह्वेनसांग ने अपनी आंखों से देखा था.

इसके अतिरिक्त आठ स्तूपों का एक विहार जिसमें बुद्ध की निर्वाण अवस्था में मूर्ति थी. यह ध्यान देने योग्य बात है कि ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार तीन विशाल स्तूपों को सीवान में पाया जाना तथा नदी का पश्चिम में होना कुशीनगर साबित करने के लिए काफी है.

चीनी यात्री फाहियान ने अपने यात्रा वृतांतों में अंगार स्तूप (लौरिया नंद गढ़ स्तूप) की कुशीनगर से दूरी 12 योजन यानी 140 किलोमीटर बताया है. वर्तमान कुशीनगर से यह दूरी सही नहीं है. सीवान से यह दूरी बिल्कुल सटीक है.

Posted by Ashish Jha

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