saran news. पारंपरिक वाद्ययंत्र ””गोपीचंद”” से नयी पीढ़ी का साक्षात्कार करा रहे उदय

पंचरा, निर्गुण की पारंपरिक गायकी में गोपीचंद जैसे वाद्य का योगदान अनूठा है

छपरा. सारण के चर्चित लोकगायक उदय नारायण सिंह पारंपरिक वाद्य यंत्र गोपीचंद को आधार बनाकर लोकगाथाओं तथा लोकगीतों का नयी पीढ़ी से साक्षात्कार करा रहे हैं. साथ ही उन पुराने वाद्य यंत्रों के महत्व को भी साझा कर रहे हैं. जो गायन की पुरानी शैली को लयबद्ध करने का भी प्रमुख माध्यम हुआ करते थे. उदय नारायण सिंह अपने शिष्यों तथा अपने परिवार के सदस्यों को भी गोपीचंद बजाये जाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं. साथ ही सोशल मीडिया पर लोकगीत, लोक गाथा, लोककथा व अन्य पारंपरिक गीतों की जुगलबंदी गोपीचंद को केंद्र में रखकर प्रस्तुत कर रहे हैं. जिससे युवा पीढ़ी खासकर युवा कलाकारों में लोकगीतों तथा पुराने वाद्य यंत्रों को और अधिक जानने की जिज्ञासा बढ़ी है.

लोकगीत व गोपीचंद का रहा है अनोखा संबंध

उदय नारायण सिंह बताते हैं कि गोपीचंद के साथ लोक संगीत के स्वरों का संबंध वर्णन करने वाला नहीं बल्कि शब्दातीत है. उसे अनुभव कर श्रोता एक अलौकिक जगत में प्रवेश कर जाता है. पंचरा, निर्गुण की पारंपरिक गायकी में गोपीचंद जैसे वाद्य का योगदान अनूठा है. उन्होंने बताया कि अभी वह लोकगाथा पर काम कर रहे हैं. पूर्व में भी सारण गाथा व कई लोकगीतों की प्रस्तुति राज्य स्तरीय व राष्ट्रीय मंचों पर दे चुके हैं. सोनपुर मेला के मुख्य मंच पर भी उनके सारण गाथा की प्रस्तुति हर साल चर्चा में रहती है. उन्होंने बताया कि अपने शिष्यों व नयी पीढ़ी को लोकगीतों के गायन और वादन शैली से अवगत कराना ही उनका प्रमुख उद्देश्य है.

कला संस्कृति विभाग भी कर रहा पहल

उन्होंने बताया कि गोपीचंद एक पारंपरिक भारतीय एकतार वाला वाद्ययंत्र है, जो मुख्य रूप से बंगाल के संगीत, बिहार के लोकगीत व अन्य भारतीय लोक संगीत में उपयोग किया जाता है. इसे एकतारा या टुंबी भी कहा जाता है. विदित हो कि कला संस्कृति विभाग बिहार सरकार द्वारा भी पुरातन कलाओं, लोकगीत व पुरातन वाद्य यंत्रों की खोयी हुई पहचान को लौटने के लिए हाल में प्रयास शुरू किया गया है. उदय नारायण सिंह का कहना है कि आगामी सोनपुर मेला जैसे प्रमुख आयोजनों में यदि गोपीचंद को केंद्र में रखकर लोकगीतों की प्रस्तुति का अवसर मंच पर दिया गया तो अधिक से अधिक नयी पीढ़ी लोक कलाओं के विविध आयामों से अवगत हो सकेगी.

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Published by: Shashi kant kumar

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