सोनपुर. विश्व प्रसिद्ध हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला न केवल भारत के ग्राम्य जीवन को दर्शाता है, बल्कि शहरी जीवन शैली का भी अनुभव कराता है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित यह मेला अपने पशु मेला के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है. सोनपुर मेला करीब एक महीने तक चलता है और इसका इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. हालांकि, समय के साथ मेले में कई बदलाव आए हैं. पहले यह मेला हाथियों के लिए प्रसिद्ध था. चिड़िया बाजार अब सख्त कानून के कारण लगभग बंद हो गया है. पशुओं का आना भी पिछले वर्षों की तुलना में कम हो गया है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन सोनपुर के तमाम घाटों पर पांच लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे. श्रद्धालुओं ने हरिहरनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की, लेकिन भीड़ और समय की कमी के कारण मेले का भ्रमण नहीं कर सके. इस दिन के बाद सरकारी स्तर पर मेले का उद्घाटन समारोह पहली बार आयोजित किया जायेगा. हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. मेले में विभिन्न धर्मों और पंथों के संत जुटते हैं. अलग-अलग पंथों के शिविरों में अध्यात्म की चर्चा होती है. केवल भजन-कीर्तन ही नहीं, बल्कि जीवन के रहस्यों को सरल तरीके से समझाया जाता है. साधु गाछी अध्यात्म का केंद्र बना रहता है. मेला में सिख, कबीर पंथ, निरंकारी मिशन, आर्य समाज, जय गुरुदेव आदि पंथों के अनुयायी आते हैं. शुक्रवार को सिख धर्म के अनुयायी मेला क्षेत्र में गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी के साथ अपने पंथ का प्रचार करते हुए दिखाई दिए. सिख धर्म में पंच प्यारे को विशेष और पूजनीय स्थान प्राप्त है. मेला में उनकी उपस्थिति और प्रचार ने क्षेत्र की धार्मिक विविधता को और उजागर किया.
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