दिघवारा : नववर्ष दहलीज पर खड़ा है और शुरुआत के लिए काउंट डाउन भी शुरू हो गया है,मगर प्रखंड के ग्रीटिंग्स बाजारों में बेरौनक है. न तो बाजार में कीमती ग्रीटिंग्स उपलब्ध हैं और न ही पहले की तरह ही खरीदार ही नजर आते हैं. ऐसा लगता है कि अब धीरे -धीरे ग्रीटिंग्स अतीत की बातें बनता जा रहा है. यूं कहें कि न तो ग्रीटिंग्स की पहले जैसी क़द्र रही और न ही उसके कद्रदान रहे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.
इंटरनेट ने चौपट किया धंधा : आज से एक दशक पूर्व ग्रीटिंग्स कार्ड का आमलोगों के बीच अच्छा क्रेज था,लोग ग्रीटिंग्स में शेरो शायरी लिखकर अपने संबंधियों व परिचितों के पास भेजा करते थे.फिर मोबाइल का उपयोग बढ़ा, तो लोगों ने मेसेज के सहारे न्यू इयर को विस करने का तरीका अपनाया. फिर जब इंटरनेट सस्ता हुआ, तो लोग अपने मोबाइलों के सहारे मेसेज व वीडियो भेज कर अपने लोगों को नववर्ष पर विस करने लगे. साइंस की तरक्की व सस्ती दर पर इंटरनेट की उपलब्धता ने ग्रीटिंग्स कार्ड का धंधा ही चौपट कर दिया. वहीं डाक विभाग की आमदनी भी कम हो गयी है.
दुकानदार भी पूंजी लगाने से करते हैं परहेज : साल-दर-साल ग्रीटिंग्स कार्ड की घटती मांग को देखते हुए अब कोई दुकानदार कार्ड की खरीदारी में अपना पूंजी लगाना नहीं चाहता है जिस कारण ग्रीटिंग्स दुकानों की संख्या में हर वर्ष कमी आ रही है. दिघवारा व शीतलपुर बाजारों में भी इस वर्ष कुछ ऐसा ही हाल है और पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष कम संख्या में ग्रीटिंग्स कार्ड की दुकानें सजी हैं.
म्यूजिक वाला कार्ड भी नहीं लुभा रहा : पहले हर किसी को म्यूजिक वाला कार्ड खूब लुभाता था.कार्ड खोलने पर बजने वाला म्यूजिक कर्णप्रिय होता था और लोग अपने यहां आने वाले उस कार्ड को सहेज कर रखते थे, मगर इंटरनेट से कार्ड की उपयोगिता ही समाप्त होने लगी है.
डाक विभाग की आमदनी को लग रहा है चूना : पहले जब ग्रीटिंग्स कार्ड का क्रेज था, तब एक महीने पूर्व से ही लोग अपने परिचितों व रिश्तेदारों के यहां कार्ड को भेजने का सिलसिला शुरू कर देते थे, मगर अब जबकि कार्ड भेजने का ट्रेंड गिरा है तो डाक विभाग की आमदनी में गिरावट आयी है, क्योंकि कम संख्या में ग्रीटिंग्स डाक द्वारा भेजे जा रहे हैं.
न उत्सुकता रही और न कार्ड सहेजने की परंपरा : एक दशक पूर्व तक लोग अपने परिचितों के यहां से ग्रीटिंग्स कार्ड के आने का उत्सुकता के साथ इंतजार करते थे और उस कार्ड को यादगार के तौर पर सहेज कर रखा जाता था,मगर यह सब बातें अब सुनने भर के लिए रह गयी है. शिक्षक बबलू पांडेय बताते हैं कि उनके पास अब भी परिचितों व स्टूडेंट्स के द्वारा कई वर्षों पूर्व भेजे गये कार्ड मौजूद हैं. उनका मानना है नववर्ष के पूर्व इंटरनेट के सहारे एंड्राइड मोबाइलों की मदद से जो ऑडियो व विज़ुअल मेसेज की बाढ़ आती है, उसमें कार्ड वाली उत्सुकता नहीं होती है.बस लोग पढ़ें और देखें और फिर मोबाइल में जगह खाली रखने के उद्देश्य से डिलिट का देते हैं.
दिन प्रतिदिन ग्रीटिंग्स की बिक्री घट रही है और ग्राहक भी ग्रीटिंग्स की खरीदारी में ज्यादा पैसा खर्च करना नहीं चाहते हैं. इसलिए कार्ड की खरीदारी में ज्यादा पूंजी नहीं लगाता हूं.
दिनेश प्रसाद,संचालक, राकेश पुस्तक भंडार, दिघवारा,सारण
कई साल से ग्रीटिंग्स कार्ड बेचने के धंधे में नुकसान हो रहा था, इसलिए इस साल कार्ड नहीं बेच रहा हूं. युवा वर्ग पहले कार्ड खरीदता था, मगर अब विस करने के लिए इंटरनेट का सहारा लेता है.
अखिलेश सिंह,संचालक, अंबे पुस्तक भंडार, दिघवारा,सारण
इंटरनेट के बढ़ते उपयोग से अब न केवल कार्ड की बिक्री कम हुई है, बल्कि डाक से भेजे जाने वाले कार्ड की संख्या में भी काफी गिरावट आयी है. लोग अब डाक से कार्ड को भेजने या आने का इंतजार करने की बजाय मिनटों में मेसेज कर विस करने के तरीके को अपनाने लगे हैं.
चितरंजन सिंह, उपडाकपाल, उपडाकघर,दिघवारा
