बाईसगामा ईदगाह देती है कौमी एकता का संदेश

दिघवारा : नगर पंचायत, दिघवारा के सैदपुर गांव में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 से सटे बाईसगामा ईदगाह मुसलिम भाइयों के इबादत स्थल के रूप में प्रसिद्ध है. रेलवे लाइन की उत्तरी छोर पर अवस्थित यह ईदगाह कौमी एकता का संदेश देता है एवं अकीकदमंद लोग इसी ईदगाह परिसर में बैठ कर नमाज अदा करते हुए […]

दिघवारा : नगर पंचायत, दिघवारा के सैदपुर गांव में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 से सटे बाईसगामा ईदगाह मुसलिम भाइयों के इबादत स्थल के रूप में प्रसिद्ध है. रेलवे लाइन की उत्तरी छोर पर अवस्थित यह ईदगाह कौमी एकता का संदेश देता है एवं अकीकदमंद लोग इसी ईदगाह परिसर में बैठ कर नमाज अदा करते हुए मुल्क में चैन, चमन व तरक्की की कामना करते हैं. इबादत स्थल के रूप में मशहूर इस जगह पर इबादत करनेवाले नमाजियों की भारी भीड़ उमड़ती है.
ईद व बकरीद में कम पड़ जाती है जगह : पूर्व में इस ईदगाह में बाईसगांवा के लोग ईद व बकरीद की नमाज अदा करने आते थे, जिस कारण इस ईदगाह का नाम बाईसगामा ईदगाह पड़ा, मगर अब इस ईदगाह में बाईसगांवों से भी अधिक गांवों के नमाजी नमाज अदा करने पहुंचते हैं.
इस ईदगाह में ईद व बकरीद की नमाज के वक्त अकीकदमंदों का सैलाब उमड़ता है एवं लगभग 10 हजार से अधिक मुसलमान एक साथ बैठ कर नमाज अदा करते हुए तरक्की की कामना करते हैं. दोनों दिन नमाज अदायगी के वक्त ईदगाह का परिसर छोटा पड़ जाता है एवं दूर-दूर तक लोग कपड़ा बिछा कर परिसर के बाहर से ही नमाज अदा करते हैं.
मुगलकालीन है ईदगाह : बाईसगामा ईदगाह की गिनती जिले के प्राचीन ईदगाहों में होती है. जानकार बताते हैं कि यह ईदगाह मुगलकालीन है एवं लगभग 1600 ई से अस्तित्व में है. लगभग 415 वर्ष पुराने इस ईदगाह की रौनक आज भी बरकरार है. रमणीक स्थल पर स्थापित इस ईदगाह की सुंदरता देखते ही बनती है.
कौमी एकता का संदेश देता है ईदगाह : बाइसगामा ईदगाह कौमी एकता का भी संदेश देता है. प्रत्येक वर्ष ईद के दिन ईदगाह परिसर में हिंदू व मुसलिम एक साथ बैठ कर ईद की नमाज अदा करते हैं. कौमी विषमता को भूल कर लगभग एक दर्जन हिंदू भी ईद की नमाज अदा करते देखे जाते हैं. ऐसे हिंदुओं को मुसलमान भाई हरसंभव सहयोग देते दिखते हैं.
शाहजहां भी ठहरे थे इसी स्थल पर : जानकार बताते हैं कि 1636 ई. में आगरा से बंगाल जाने के समय मुगल सम्राट शाहजहां कुछ समय यहां ठहरे थे एवं यहीं कहीं जुमे की नमाज अदा की थी. मगर, ऐसी बातों का कोई लिखित प्रमाण नहीं मिला है. ईदगाह परिसर में एक कुआं है, जिसके स्लैब पर कुछ लिखा गया है. स्थानीय लोग आज तक उस भाषा व लिखित तथ्य को नहीं जान पाये हैं.

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