कुव्यवस्था . शिक्षा व संस्कार से दूर स्लम बस्ती के बच्चे
कागजों में सिमट कर रह गयी सरकारी योजनाएं
छपरा(नगर) : समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक विकास की योजनाओं को पहुंचाने के लिए सरकार व उसके नुमाइंदे लगातार कोशिश कर रहे हैं, पर शहर की गलियों में कचरे की ढेर में अपना बचपन ढूंढ़ रहे मासूम बच्चों को देखकर ऐसा लगता है कि शायद सरकार की तमाम योजनाएं कागजों तक ही सिमट कर रह गयी हैं. छपरा शहर के प्रायः सभी मुहल्लों में दिन के समय आपको ऐसे कई छोटे-छोटे बच्चे दिख जायेंगे, जो गलियों में इकट्ठा कचरे की ढेर से प्लास्टिक या अन्य जरूरी सामान चुनते हैं. इन बच्चों का उद्देश्य महज इतना होता है कि चुने हुए प्लास्टिक को बेचकर शाम के रोटी की जुगाड़ हो सके.
स्लम में रखने वाले दर्जनों बच्चे स्कूल की पाठशाला को छोड़ कचरे में पेट की खुराक ढूंढते हैं. बाल संरक्षण इकाई द्वारा एनजीओ की मदद से ऐसे मुहल्लों में रहने वाले बच्चों को चिह्नित कर उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के कार्यक्रम चलाये जाते हैं. हालांकि साल के 365 दिनों में दो-चार सप्ताह ही कुछ योजनाएं इन बस्तियों में सक्रिय दिखाई देती हैं. अधिकतर समय योजनाएं कागजों में ही सिमट कर रह जाती हैं.
एनजीओ की पहुंच से दूर हैं स्लम बस्ती : सरकार के साथ-साथ एनजीओ की पहुंच से भी स्लम बस्तियां दूर हैं. लाखों रुपये का प्रोजेक्ट लेकर चल रहे ऐसे कई एनजीओ हैं, जिनके पास इन बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए करने को बहुत कुछ है. अखबारों में सुर्खियां बटोरने के लिये एकाध बार कुछ एनजीओ अपने वोलेंटियर्स के साथ इन बस्तियों में आये भी थे, पर कुछ किताबें और पेंसिल बांट इन बच्चों के साथ फोटो खिंचाने के बाद इनकी योजनाओं पर विराम लग गया.
युवाओं व बुद्धिजीवियों के प्रयास से जगी आस : कचरा चुनने वाले मासूम बच्चों के अभिभावक जागरूक तो हैं, पर उचित सुविधा नहीं मिल पाने के कारण इन्हें भी निराशा हाथ लगती है. कुछ बस्तियों में शहर के युवाओं और बुद्धिजीवियों द्वारा निःशुल्क पाठशाला लगायी जाती है, जिसके माध्यम से गरीब बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है और इनमें संस्कार का भी विकास किया जाता है. शिक्षाविद रामदयाल शर्मा बताते हैं कि देश की आजादी के बाद कई एनजीओ बने पर स्लम बस्तियों में कार्य करने के प्रति काफी उदासीनता देखी जाती है.
युवा समाजसेवी मंटू कुमार यादव व उनकी टीम द्वारा शहर के चुनिंदा स्लम बस्तियों में निःशुल्क पाठशाला आयोजित करायी जाती है.
बच्चों को भी है मदद का इंतजार
डाकबंगला रोड राजेंद्र स्टेडियम के पीछे स्लम बस्ती में रहने वाले सुशील कुमार बताते हैं कि कचरा चुनना उन्हें या उनकी बस्ती के बच्चों को अच्छा तो नहीं लगता पर मजबूरी में ऐसा करना पड़ता है. हालांकि यह बच्चे शाम के समय घर में फटे पुराने किताबों के साथ पढ़ाई भी करते हैं. वहीं सुकेश, रंजीत, तेना, बाबुल जैसे कई ऐसे गरीब बस्ती के बच्चे हैं, जिन्हें दो वक्त के रोटी की जुगाड़ के लिए ऐसा करना पड़ता है. साढ़ा खेमाजी टोला स्लम बस्ती की देवंती देवी अपने बच्चों को कचरा बीनते देख बहुत दुखी होती हैं. पति साफ-सफाई का काम करते हैं. देवंती बताती हैं कि कुछ दिनों से हर रविवार कुछ कॉलेज के लड़के-लड़कियां बस्ती में आते हैं और बच्चों को पढ़ने-लिखने की बात बताते हैं. उन्हें आज भी उम्मीद है कि सरकारी बाबू आयेंगे और बच्चों के लिए कुछ जरूर करेंगे. फिलहाल इन जैसे कई अभिभावक शिक्षा व संस्कार की बातों से दूर दो वक्त के निवाले के लिए दिनरात संघर्षरत हैं.
क्या कहते हैं अधिकारी
गरीब बस्ती के बच्चों को नियमित शिक्षा मिल सके तथा उनका सर्वांगीण विकास हो इसके लिए सरकार की योजनाओं को गति दी जा रही है. ऐसे बच्चों के मदद के लिये एनजीओ की मदद भी ली गयी है.
बेबी कुमारी, प्रभारी पदाधिकारी, जिला बाल संरक्षण इकाई
क्या कहते हैं समाजसेवी
स्लम बस्तियों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना होगा, ताकि मासूमों का बचपन कचरे की ढेर से दूर हो सके. विद्या भारती द्वारा कई बस्तियों में संस्कार केंद्र चलाये जा रहे हैं और बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है.
रामदयाल शर्मा, शिक्षाविद
सरकार की योजनाओं से कुछ नहीं होगा. यदि सरकार और प्रशासन सक्रिय रहते, तो बच्चे कचरे की ढेर में अपना बचपन नहीं ढूंढ़ते. मेरे जैसे कई युवाओं के प्रयास से आज शहर के स्लम बस्ती में निःशुल्क पाठशाला आयोजित की जा रही है.
मंटू कुमार यादव, सामाजिक कार्यकर्ता
रिहायशी इलाकों में चुनते हैं प्लास्टिक
शहर के डाक बंगला रोड, नगरपालिका चौक, साहेबगंज, योगिनिया कोठी, सरकारी बाजार, हथुआ मार्केट, सब्जी बाजार, गुदरी आदि प्रमुख इलाकों में दिन के वक्त अक्सर इन मासूमों को कचरा चुनते देखा जा सकता है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि कई बार आधिकारियों की नजर भी इनपर पड़ती है, पर इनकी मजबूरी को हर बार अनदेखा कर दिया जाता है और स्लम बस्ती के बच्चों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आ पाता.
रोजाना 30 से 40 रुपये होते हैं इकठ्ठा
कचरे की ढेर से प्लास्टिक चुनने के बाद यह बच्चे इसे अपनी बस्ती में ले जाते हैं. पहले वहां इसकी छटनी होती है, जो प्लास्टिक कामयाब होता है, उसे अलग बोरियों में रखा जाता है और जो थोड़ा सड़ा-गला होता है उसे अलग छांट दिया जाता है. रोजाना इकट्ठा हुए प्लास्टिक, लोहा-टीना इत्यादि को सप्ताह में एक दिन कबाड़ी वाले के पास बेचा जाता है. अगर रोज का हिसाब लगायें तो कचरा चुनकर 30 से चालीस रुपये प्रतिदिन का जुगाड़ हो जाता है.
