प्रतिदिन शहर में एक टन पॉलीथिन बैग
की होती है खपत, आवारा पशुओं की मौत
का सबसे बड़ा कारण है प्लास्टिक
नाला जाम का कारण पॉलीथिन बैग में कचरे को फेंकना है, स्वास्थ्य के लिए भी काफी नुकसानदेह है प्लास्टिक का उपयोग
समस्तीपुर : हर साल पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. इस दिन गांव से लेकर शहरी क्षेत्रों तक पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. इसके माध्यम से पर्यावरण को होने वाले नुकसान व उससे बचाव को लेकर लोगों को जानकारियां दी जाती हैं. स्कूल, कॉलेज से लेकर हर स्तर पर इसको लेकर कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं.
मकसद होता है प्रदूषण को कम करना. पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान हमारे दैनिक उपयोग में लाये जाने वाले पॉलीथिन से होता है. प्लास्टिक के बोतल एवं उसके ढक्कन के अलावा पॉलीथिन थैलों से पूरे देश में पर्यावरण दूषित हो रहा है. बंद बोतल के पानी का सेवन करने के बाद बोतल व उसके ढक्कन को यत्र-तत्र फेंकने से अनेकों समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं. जबकि, बढ़ती जनसंख्या व बदलती जीवनशैली के कारण पर्यावरण पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है.
प्लास्टिक की बोतल व थैले पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती : प्लास्टिक की बोतल व उसका ढक्कन पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है. भारत सरकार द्वारा 40 माइक्रोन से कम मोटाई के प्लास्टिक थैलों पर तो वैधानिक रूप से प्रतिबंध लगाया जा चुका है. किंतु, बोतलों का उपयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है. इसे सीमित किया जाना आवश्यक है. बोतलों को सीमित नहीं किया गया, तो आने वाला समय और भयावह होगा. पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से बोतलों को सीमित किया जाना आवश्यक है. पानी पीने के बाद बोतल का दोबारा उपयोग किसी भी स्थिति में नहीं किया जाना चाहिए.
मानव ग्रंथियों के लिए नुकसानदेह : स्वास्थ्य व पर्यावरण के दृष्टिकोण से बोतलों का उपयोग मनुष्य के लिए हानिकारक है. बोतलों के निर्माण में केमिकल का प्रयोग किया जाता है. जो मानव ग्रंथियों के लिए नुकसानदेह है. बोतलों का ढक्कन यत्र-तत्र फेंक दिया जाता है. जानवरों द्वारा विचरण करने के दौरान बोतल का ढक्कन खाने से प्रत्येक वर्ष करीब 10 लाख पशु-पक्षी व मछलियों की मृत्यु हो जाती है. बंद बोतल के बढ़ते प्रचलन से कुल कचरे में चार-पांच प्रतिशत प्लास्टिक पाया जाता है. यही कारण है कि कचरे बिखरकर नालियों में इकट्ठा हो जाता है. जो नालियों, गटरों, सिवरेज डिस्पोजल पाइपों में अवरोध पैदा करता है. शहर में अवारा पशुओं की मौत सर्वाधिक प्लास्टिक थैले के खाने से होती है.
शहर में हर रोज एक टन से ज्यादा पॉलीथिन थैले का होता है उपयोग : देश व प्रदेश की बात को छोड़ दें, तो सिर्फ समस्तीपुर के शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन करीब एक टन प्लास्टिक थैले का उपयोग होता है. शहर में करीब दस हजार दुकानें हैं. जेनरल स्टोर की दुकान हो या किराना की. रेडिमेड कपड़े की दुकान हो या दवा की. कोई ऐसी दुकान नहीं है जहां आपको पॉलीथिन बैग में सामान न देते हों. यदि एक दुकानदार प्रतिदिन सौ ग्राम ही प्लास्टिक का खपत करता है, तो यह करीब एक टन होता है. यह प्लास्टिक के थैला इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है. शहर में नाला जाम की सबसे बड़ी समस्या प्लास्टिक का थैला है.
जानकारों की मानें तो एक प्लास्टिक थैले की उम्र करीब दो सौ साल होती है. मिट्टी में घुलनशील नहीं होने के कारण यह पर्यावरण को नुकसान तो पहुंचाता ही है हमें दूसरी तरह से भी समस्याएं होती हैं.
आज विश्व पर्यावरण दिवस है. इस दिन पूरा विश्व संकल्प लेता है कि हम पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचायेंगे. पर्यावरण को नुकसान पहुंंचानेवाली चीजों का इस्तेमाल न के बराबर करेंगे. पेड़-पौधे लगा कर पर्यावरण की रक्षा करेंगे. वायुमंडल को प्रदूषित होने से बचाने के लिए हर संभव उपाय करेंगे. इस तरह की सीख गांव से लेकर देश की राजधानी तक में होती है. कई कार्यक्रम जागरूकता को लेकर आयोजित किये जाते हैं. पर, पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है पॉलीथिन के इस्तेमाल से. ऐसे में पर्यावरण के लिए कितना नुकसानदेह है पॉलीथिन. इस अवसर प्रस्तुत है यह रपट.
