कोरबद्धा गांव में परसा मातमी सन्नाटा
समस्तीपुर : कोरबद्धा गांव की मनीषा और सविता के बीच की दोस्ती की मिशाल दी जाती थी. मरते-मरते मनीषा ने इसे सच करके भी दिखाया. एक साथ उठने बैठने और सुख-दुख की बातें करने वाली दोनों सखियों ने सोचा भी न होगा कि एक दिन वह उसके लिए जान की बाजी लगा देगी. लेकिन जब गुरुवार को जरूरी हुआ तो मनीषा दोस्ती की कसौटी पर खरा उतर कर फिर से मिशाल कायम किया.
दफन हो गयी डोली में बिठाने की तमन्ना
रोज की भांति गुरुवार को भी दोनों सखियां घास लाने के लिए जमुआरी नदी पार कर रही थी. मनीषा ने तो नदी पार भी कर लिया. लेकिन उसकी सखी बीच मंझधार में फंस कर डूबने लगी. जिसे देख कर मनीषा को रहा न गया और उसने वापस नदी में छलांग लगा दी. ताकि अपनी सखी को बचा सके.
लेकिन क्रूर काल को यह पसंद नहीं आया और सविता ने जैसे ही मनीषा को जकड़ कर पकड़ा जीवन देने पहुंची मनीषा भी डूब गयी. लाश के पास मृतका के घर विलाप कर रही मनीषा की मां जागो देवी चीख चीख कर अपनी पुत्री की मौत के लिए ऊपर वाले को कोस रही थी. मजदूर पिता आंखों में आंसू लेकर अपनी दशा पर चुप था. दो भाई और चार बहनों में मनीषा सबसे बड़ी थी. जिन्हें अपनी बहन को खोने का गम बरदाश्त नहीं हो रहा था सो बच्चे विलख कर बेहोश से हो जा रहे थे.
वहीं नौ भाई बहनों में सविता गनौर सहनी की तीसरी लड़की थी. परिजनों को ढांढस बंधा रहे लोग आपस में दोनों सहेलियों की प्रीत की चर्चा करते नहीं अघा रहे थे. लोगों का कहना था कि जीवन के अंतिम क्षण में भी मनीषा ने सविता को बचाने की कोशिश कर मित्रता की मिशाल पेश कर दी. बताते चलें कि मनीषा के परिजन उसकी शादी के लिए चर्चा कर रहे थे.
कई रिश्ते पसंद भी आये थे. जिसके बाद उसके माता पिता ने घर में शादी की तैयारी में मन ही मन शुरू कर दी थी. लेकिन उसके माता-पिता का बेटी को मेहंदी लगाकर और डोली में बैठा कर ससुराल विदा करने की ख्वाहिश अंदर ही दफन होकर रह गयी.
