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Arya Go कैब से स्टार्टअप में छा गया मिथिला का कोसी इलाका, दिलखुश टैक्सी वाला बना नया आइकन

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
दिलखुश
दिलखुश
प्रभात खबर

कुमार आशीष, मधेपुरा. खुल जायेंगे सभी रास्ते, रुकावटों से लड़ तो सही, सब होगा हासिल, तू जिद पर अड़ तो सही... यह पंक्तियां मधेपुरा और सहरसा से वर्ष 2016 में कैब की शुरुआत करनेवाले दिलखुश पर सटीक बैठती हैं. दिलखुश के पिता बस में ड्राइविंग करते थे. ऐसे में ड्राइवर के पुत्र ने ओला, उबर के तर्ज पर कोसी के इलाके में कैब की शुरुआत करने का सपना देख लिया था, जिसे लोग मजाकिया लहजे में लेने लगे थे.

समाज में मिलने वाले ताने व फिरकी को नजरअंदाज कर दिलखुश लगातार अपने प्रोजेक्ट पर काम करता रहा. नतीजतन दिलखुश के प्रोजेक्ट को बिहार सरकार ने हाथों हाथ लिया. इसके बाद बिहार में कोसी के इलाके से एक कैब की शुरुआत आर्या गो कैब के रूप में हो गयी. धीरे-धीरे कैब का दायरा बढ़ता गया. वर्तमान में यह कैब सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, दरभंगा, मधुबनी में अपनी सेवा दे रहा है. फिलवक्त सौ से अधिक गाड़ियां व कॉल सेंटर के जरिये दो सौ के करीब प्रोफेशनल कंपनियों से जुड़कर अपनी जीविका चला रहे हैं.

शुरू हुआ इंटरव्यू का दौर

दिलखुश लिखते हैं कि जिस बिल्डिंग में गया वहां मेरे जैसे 10 से 15 लोग पहले से मौजूद थे. सब बारी-बारी से अपना इंटरव्यू देकर निकल रहे थे. जब मेरी बारी आयी तो मैं भी अंदर गया. सामने तीन पुरुष और दो महिलाएं बैठी हुई थीं. प्रणाम-पाती किये तो साहब लोगों को बुझा गया कि लड़का पूरा देहाती है.

नाम-पता परिचय संपन्न होने के बाद एक साहब ने अपना फोन उठाया. फोन का लोगों मुझे दिखाते हुए बोले, इस कंपनी का नाम बताओ? दिलखुश ने बताया कि मैंने इस फोन के लोगो को पहली बार देखा था. मुझे नहीं पता था इसलिए मैंने कह दिया सर मैं नहीं जानता हूं, तब साहब का जवाब आया ये आइ फोन है और ये एप्पल कंपनी का है.

मेरी नौकरी तो नहीं लगी, वापस गांव आया और विरासत में मिली ड्राइवरी के गुण को पेशा बनाकर पिताजी के रास्ते पर ही निकल पड़ा और आज…..साहब का आइ फोन दिखाने का स्टाइल कल तक मेरी आंखों में घूम रहा था. आज आइ फोन आ गया. अब शायद आज से साहब याद नहीं आयेंगे.

फेसबुक पर एक पोस्ट से वायरल हो गया

तीन दिन पहले दिलखुश ने अपने फेसबुक पेज पर अपने आइ फोन मिलने की खुशी जाहिर करते एक आपबीती का जिक्र किया, जिसे देश के बड़े-बड़े वेब पोर्टल ने अपने प्लेटफाॅर्म पर पब्लिश कर दिलखुश की कहानी को घर-घर तक पहुंचा दिया.

लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है साहब

आज मंगलवार को आइ फोन 11 मिल गया. आज से लगभग 10 वर्ष पूर्व सहरसा में जॉब मेला लगा था. मैं भी बेरोजगार की श्रेणी में खड़ा था़ पापा मिनी बस चलाते थे, तनख्वाह लगभग 45 सौ रुपये थी, जिसमें घर चलाना कठिन हो रहा था. ऐसे में मुझे नौकरी की जरूरत महसूस होने लगी़ मैंने भी उस मेले में भाग लिया, जहां पटना की एक कंपनी ने अपने सारे दस्तावेज जमा किये थे, उसी कंपनी के एक साहब थे. उन्होंने कहा, आपका आवेदन पटना भेज रहे हैं.

पांच अगस्त को पटना के एसपी वर्मा रोड में आ जाइयेगा. वहां इंटरव्यू होगा. वहां सफल हो गये तो 24 सौ रुपये महीने की सैलरी मिलेगी. मैं उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. कई रात ठीक से सो नहीं पाया था. बस उसी नौकरी के बारे में सोचता रहता था. लगभग एक हफ्ता इंतजार के बाद पांच तारीख आ ही गयी. सुबह 5 बजे सहरसा से पटना की ट्रेन थी, जो 11 बजे तक पटना पहुंचा देती थी. इंटरव्यू का वक्त तीन बजे का था.

Posted by Ashish Jha

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