कोसी क्षेत्र के विधान पार्षद (MLC) डॉ. अजय कुमार सिंह ने बिहार के त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों के कई महीनों से लंबित मानदेय के शीघ्र भुगतान को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है. उन्होंने राज्य सरकार से मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य, पंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य एवं नगर निकायों के वार्ड पार्षदों के बकाए मानदेय को अविलंब जारी करने का पुरजोर अनुरोध किया है. डॉ. सिंह ने कहा कि पहले से ही अल्प मानदेय पाने वाले इन जन प्रतिनिधियों को महंगाई के इस दौर में भुगतान न मिलना घोर अन्याय है.
मानदेय कोई कृपा नहीं, जन प्रतिनिधियों का अधिकार
मुख्यमंत्री के अलावा पंचायती राज मंत्री, मुख्य सचिव और पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में विधान पार्षद डॉ. अजय कुमार सिंह ने प्रशासनिक उदासीनता पर गंभीर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा कि सरकार पंचायत प्रतिनिधियों को पहले से ही बेहद सीमित मानदेय देती है. इसके बावजूद कई महीनों से मानदेय का भुगतान अटका हुआ है, जिससे स्थानीय स्तर पर दिन-रात जनता की सेवा करने वाले प्रतिनिधियों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो गया है. उन्होंने दो टूक कहा कि मानदेय पाना पंचायत प्रतिनिधियों का वैधानिक अधिकार है और सरकार को इसमें अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए.
अधिकारों में कटौती से प्रतिनिधियों में गहरा आक्रोश
एमएलसी ने राज्य सरकार पर पंचायत प्रतिनिधियों के संवैधानिक अधिकारों में लगातार कटौती करने का आरोप लगाया:
- सीमित भागीदारी: मुखिया, प्रमुख और अन्य प्रतिनिधियों के विकासात्मक अधिकारों को लगातार सीमित किया जा रहा है.
- वार्ड सदस्यों की उपेक्षा: विकास कार्यों में वार्ड सदस्यों की भागीदारी न्यूनतम कर दी गई है.
- नल-जल योजना से बेदखली: पूर्व में अधिकांश पंचायतों में 'हर घर नल का जल' योजना के क्रियान्वयन और रखरखाव की जिम्मेदारी वार्ड सदस्यों के पास थी, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उन्हें इस महत्वपूर्ण भूमिका से भी वंचित कर दिया गया है.
'ग्राम स्वराज' की मूल भावना पर प्रहार
डॉ. अजय कुमार सिंह ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर व सशक्त बनाकर देश का समग्र विकास चाहते थे. गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि गांवों की खुशहाली के बिना शहरों के विकास की कल्पना बेमानी है.
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकारें पंचायतों को अधिकार विहीन बनाकर सत्ता के केंद्रीकरण की दिशा में काम कर रही हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और 'ग्राम स्वराज' की अवधारणा के पूरी तरह प्रतिकूल है. उन्होंने सरकार से मांग की कि पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय का तत्काल भुगतान किया जाए और उनके अधिकारों को पुनः बहाल किया जाए.
