कल जन्मेंगे कान्हा! रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी का व्रत क्यों माना जा रहा खास, जानें पूजा से भोग तक की पूरी जानकारी

जन्माष्टमी 2026 का पर्व रोहिणी नक्षत्र में पड़ रहा है, जो इसे विशेष फलदायी बनाता है. जानें कान्हा के जन्मोत्सव की पूजा विधि, मध्यरात्रि में अभिषेक और दही-माखन-मिश्री जैसे प्रिय भोग लगाने की जानकारी. संतान प्राप्ति की कामना रखने वालों के लिए भी यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है.

Krishna Janmashtami 2026: सहरसा में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का इंतजार अब खत्म होने वाला है. शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखा जाएगा और मध्यरात्रि में कान्हा के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा. इस बार रोहिणी नक्षत्र युक्त अष्टमी तिथि में जन्माष्टमी पड़ने के कारण व्रत और पूजन को विशेष फलदायी माना गया है. ऐसे में श्रद्धालुओं के बीच यह जानने की उत्सुकता है कि जन्माष्टमी पर पूजा किस समय और किस तरह की जाए, भगवान को कौन-कौन से भोग लगाए जाएं और किन मंत्रों का जाप शुभ माना जाता है.

ब्रज किशोर ज्योतिष संस्थान एवं फाउंडेशन के संस्थापक एवं ज्योतिषाचार्य पंडित तरुण झा ने बताया कि मिथिला विश्वविद्यालय पंचांग के अनुसार उदयव्यापिनी रोहिणी नक्षत्र युक्त अष्टमी तिथि में चार सितंबर को श्रीकृष्णाष्टमी व्रत, जन्मोत्सव, गोकुलाष्टमी, मोहरात्रि एवं शक्ति पूजन करना सर्वोत्तम माना गया है. उन्होंने श्रद्धालुओं से विधि-विधान के साथ व्रत रखने और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव एवं पूजन में शामिल होने की अपील की.

आधी रात में क्यों होगा कान्हा का जन्मोत्सव

जन्माष्टमी की पूजा में मध्यरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है. इसी समय भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का आयोजन किया जाएगा. श्रद्धालु व्रत रखते हुए दिनभर भगवान का स्मरण और पूजन करेंगे और रात में जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना करेंगे.

पंडित तरुण झा के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र से युक्त अष्टमी तिथि में जन्माष्टमी का व्रत और पूजन विशेष फलदायी माना गया है. इसलिए श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना करें.

दही, माखन और मिश्री से सजेगा कान्हा का भोग

श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं. जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण को दही, माखन, मिश्री, तुलसीदल और मोदक का भोग लगाने की सलाह पंडित तरुण झा ने दी है.

मध्यरात्रि में भगवान को पंचामृत का भोग भी अवश्य लगाने की बात कही गयी है. पंचामृत दूध, दही, घी, गंगाजल और शहद से तैयार किया जाता है. जन्मोत्सव के समय पंचामृत से भगवान का अभिषेक और फिर विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है.

पूजा नहीं कर पाएं तो इस मंत्र का करें जाप

कई श्रद्धालु नौकरी, स्वास्थ्य या अन्य कारणों से जन्माष्टमी पर विस्तृत पूजा-पाठ नहीं कर पाते हैं. ऐसे लोगों के लिए भी धार्मिक आस्था में एक सरल उपाय बताया गया है.

पंडित तरुण झा ने कहा कि जो श्रद्धालु किसी कारणवश विस्तृत पूजा-पाठ करने में असमर्थ हैं, वे ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का यथासंभव जाप कर सकते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस मंत्र का जाप जीवन के कष्टों को दूर करने में सहायक माना जाता है.

उनके अनुसार, श्रद्धालुओं को अपनी सुविधा के अनुसार श्रद्धा और भक्ति से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए. जन्माष्टमी में पूजा का उद्देश्य केवल अनुष्ठान पूरा करना नहीं, बल्कि भक्ति और आध्यात्मिक भाव के साथ भगवान का स्मरण करना भी है.

गीता का पाठ करना भी माना गया शुभ

जन्माष्टमी के दिन श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना भी शुभ माना गया है. पंडित तरुण झा ने बताया कि संभव हो तो श्रद्धालुओं को इस दिन गीता का पाठ करना चाहिए. धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे मनोवांछित फल की प्राप्ति की कामना की जाती है.

जो लोग पूरा पाठ नहीं कर सकते, वे भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए मंत्र जाप कर सकते हैं. इस तरह व्यस्त दिनचर्या के बीच भी श्रद्धालु जन्माष्टमी के धार्मिक महत्व से जुड़ सकते हैं.

Krishna Janmashtami 2026: संतान प्राप्ति की कामना रखने वालों के लिए भी खास

ज्योतिषाचार्य पंडित तरुण झा ने बताया कि संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है. श्रद्धालुओं को इस दिन पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और पूजन करना चाहिए.

जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है. सहरसा समेत आसपास के क्षेत्रों में शुक्रवार को श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारी करेंगे. मध्यरात्रि में पूजा-अर्चना और भोग के साथ कान्हा के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा.

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By Vinay Kumar Mishra

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