मधेपुरा: सावधान ! कोसी क्षेत्र के पेय जल में खतरनाक जहर घुला है. आर्सेनिक नाम का यह जहर पेय जल के जरिये मानव शरीर में त्वचा कैंसर सहित कई रोगों को जन्म दे रहा है. विडंबना यह है कि इस जहर को न तो किसी वाटर प्यूरीफायर से और न पानी को उबाल कर खत्म किया जा सकता है. बिहार में आर्सेनिक ने पहले गंगा क्षेत्र को जहरीला बनाया था, अब कोसी क्षेत्र में इस जहर ने गंगा क्षेत्र को भी पीछे छोड़ दिया है. अब बिहार के आर्सेनिक खतरे जोन में अब मधेपुरा व सहरसा का नाम भी जुड़ गया है. कोसी क्षेत्र के पेय जल में आर्सेनिक खतरनाक स्तर पर मौजूद है. महावीर कैंसर संस्थान से आयी रिसर्च टीम की जांच में यह पाया गया है कि मधेपुरा और सहरसा में पेयजल में आर्सेनिक की मात्र काफी खतरनाक स्तर तक मौजूद है. लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पेय जल का सेवन विभिन्न तरह के कैंसर को जन्म देता है. यह रिसर्च टीम पिछले चार-पांच दिनों से कोसी प्रमंडल के तीनों जिलों में कोसी और इसकी सहायक नदियों के आसपास के इलाकों में पेयजल में आर्सेनिक की मात्र की जांच कर रहे हैं. नतीजे काफी चौंकाने वाले हैं. मधेपुरा के मुरलीगंज के कुछ क्षेत्रों में पांच गुणा तथा जिला मुख्यालय के आसपास के क्षेत्र के कई जगहों पर चापाकल में आर्सेनिक की मात्र दो गुणा तक पायी गयी है. इस रिसर्च के बाद बिहार में आर्सेनिक से प्रभावित जिलों की संख्या में दो और जिले जुड़ गये हैं. कोसी प्रमंडल का सहरसा और मधेपुरा जिला भी अब आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में शामिल हो गया है.
सुपौल जिला
राघोपुर प्रखंड – दो गुणा अधिक स्तर
बसंतपुर प्रखंड – दो से दस गुणा अधिक स्तर
सदर प्रखंड – दो से पांच गुणा तक
निर्मली प्रखंड – दो गुणा तक
सरायगढ प्रखंड – दो से पांच गुणा तक
(कोसी नदी के किनारे भीमनगर, घूरन, बैरिया, पिपरा खुर्द, सिमरी एसएसबी कैंप, बलवा आदि जगहों पर)
सहरसा जिला
नवहट्टा प्रखंड – दो से छह गुणा तक
महिषी प्रखंड – दो से पांच गुणा तक
(कोसी नदी के किनारे नवहट्टा, पहाडपुर, सरौनी, महिषी उ, महिषी द. बलुआ, तेघरा आदि स्थान)
मधेपुरा जिला
मुरलीगंज प्रखंड – दो से पांच गुणा तक
सदर प्रखंड – दो गुणा तक
(सुरसर नदी के किनारे बलुआहा तथा चिलौनी नदी के किनारे मदनपुर, भिरखी, सधवा)
आर्सेनिक रिसर्च क्यों
‘स्डडी आफ आर्सेनिक एकोमोलेशन इन पीपुल आफ बिहार एडं इट्स को-रिलेशन विद आर्सेनिक इंड्यूस्ड कार्सिनोजेनिसिटी इन एनीमल मॉडल’ नाम के इस रिसर्च प्रोजेक्ट के को-इंवेस्टीगेटर सह महावीर कैंसर संस्थान के निदेशक पद्मश्री डॉ जितेंद्र कुमार सिंह व मुख्य इंवेस्टीगेर सह महावीर कैंसर संस्थान में हेड आफ रिसर्च सेंटर प्रो डॉ अखिलेश्वरी नाथ ने बिहार में आर्सेनिक के कारण होने वाले कैंसर पर शोध की जरूरत समझी. ताकि इसके निदान की ओर भी कार्य किया जा सके. इनके प्रयास से इस प्रोजेक्ट को भारत सरकार ने फंड दिया. अब बिहार के विभिन्न क्षेत्र में पेयजल के सैंपल की जांच की जा रही है और इसमें आर्सेनिक की मात्र का पता लगाया जा रहा है. रिसर्च फेलो हेमंत एवं टेकनीशियन शैलेंद्र बताते हैं कि पेयजल में पाये गये आर्सेनिक जितनी मात्र ही चूहों में डाल कर उत्तकों और कोशिकाओं पर पड़ रहे प्रभाव का अध्ययन किया जायेगा. इसके बाद कोसी क्षेत्र से आने वाले कैंसर के मरीज के उत्तक और रक्त की जांच कर चूहों पर किये गये प्रयोगों से मिलाया जायेगा. तब जो आंकड़े मिलेंगे इनसे कैंसर के इलाज की संभावना का मार्ग प्रशस्त होगा.
11 साल में हो गये 18 जिले
रिसर्च टीम के जूनियर रिसर्च फेलो हेमंत कुमार एवं लैब टेकनीशियन शैलेंद्र कुमार ने बताया कि वर्ष 2002 में केवल भोजपुर जिला आर्सेनिक प्रभावित था लेकिन वर्ष 04 में इसमें पटना शामिल हो गया. वर्ष 05 में वैशाली और भागलपुर, वर्ष 07 में कटिहार, खगडिया, मुंगेर, सारण, बक्सर, बेगुसराय, शेखपुरा, लखीसराय का नाम जुड़ा. वर्ष 2013 में अब तक सुपौल, पूर्णिया, किशनगंज, समस्तीपुर और दरभंगा भी इस सूची में आये. अब इस शोध के बाद मधेपुरा और सहरसा भी इस खतरनाक जोन में आ गये हैं.
कैंसर हो सकता है
आर्सेनिक सल्फाइड का पता बहुत पहले लग चुका था. कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में इसका वर्णन किया है. उसमें इस अयस्क का नाम हरिताल है. प्राचीन काल में इसका उपयोग हस्तलिखित पुस्तकों में अशुद्ध लेख को मिटाने के लिए किया जाता था. यूनानियों ने आर्सेनिक सल्फाइड का अध्ययन चौथी शताब्दी ईपूर्व किया था. सन 1733 ई में ब्रैंट ने यह सिद्ध किया कि आर्सेनिक एक तत्व है. सन 1817 में स्वीडन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बर्जीलियस ने इसका परमाणु भार निकाला. यौगिक अवस्था में आर्सेनिक पृथ्वी पर ज्वालामुखी के वाष्प, समुद्र तथा अनेक खनिजीय जल में मिश्रित रहता है. लकड़ियों के पेंट, कीटनाशक आदि में इसका इस्तेमाल किया जाता है. अगर यह शरीर में अधिक मात्र हो जाये तो लकवा के लक्षण पैदा करता है. आंत और उत्तकों को नुकसान पहुंचाता है.
