सहरसा: सोमवार को हुई जोरदार बारिश ने यह एहसास दिला दिया कि अगर जल्दी ही ड्रेनेज सिस्टम नहीं बना तो कोई भी घर महफूज नहीं रहेगा. सभी घरों में पानी का जाना तय हो जायेगा. हालांकि शहर में वाटर ड्रेनेज सिस्टम बनाने की मांग आज की नहीं, बल्कि एक दशक से भी ज्यादा की है. स्थिति और भयावह ही होती जा रही है. लेकिन जिम्मेदार और शहर की जवाबदेही तय करने वाले अधिकारियों का हाल ऐसा है कि एक बार तैयार हुआ सर्वे और डीपीआर तय समय पर नहीं पहुंच पाया और वह प्रपोजल फेल हो गया. अब फिर से इसे नये सिरे से शुरू करवाया गया है.
मिली जानकारी के अनुसार, यह योजना केंद्र सरकार के द्वारा करवायी जाती है, जिसमें विभिन्न राज्यों के शहरों की स्थिति और सर्वे सहित डीपीआर को प्रस्तुत करना होता है, लेकिन सहरसा के साथ ऐसा इसलिए नहीं हो पाया कि यहां के अधिकारी अपने कछुआ गति से आगे तेज कदम नहीं बढ़ा सके. इधर, वाटर ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने के कारण जल की निकासी नहीं हो पाती है. नतीजा थोड़ी सी भी बारिश हुई नहीं कि पूरे शहर की सड़कों पर तालाब जैसा नजारा छा जाता है. पैदल चलने लायक तक जगह नहीं बचती. सोमवार को ऐसा ही हुआ. पिछले कई सालों से चले मंथन के बाद चार वर्ष पूर्व शहर के लिए वाटर ड्रेनेज सिस्टम की परिकल्पना को साकार करने की कोशिश की गयी थी. अधिकारियों सहित शहर के जनप्रतिनिधियों व बुद्धिजीवियों को बुला कर मास्टर प्लान बताया गया और नक्शा भी दिखाया गया. लोगों में आस बंधी कि अब शहर को जल जमाव से मुक्ति मिल जायेगी. लेकिन अब तक ऐसा कुछ नहीं हो पाया और इस दिशा में विभागों के बीच हो रही खींचातानी से लगता है कि अभी इस पर काम होना मुश्किल है. मालूम हो कि पूर्व में बिहार सरकार के नगर विकास विभाग द्वारा शहर में जल निकासी की योजना बनायी गयी थी, जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेवारी स्थानीय पीएचइडी विभाग को दी गयी थी. विभाग द्वारा दिल्ली की एक कंपनी के माध्यम से शहर में सर्वे कर सिस्टम को चालू करवाने के लिए डीपीआर भी तैयार करवाया गया था. इसके बावजूद ड्रेनेज सिस्टम का काम शुरू नहीं हो पाया. मालूम हो कि इस योजना को पूरा करने के लिए एनडीए -1 शासन में एक करोड़ छियालीस लाख की राशि भी विभाग द्वारा आवंटित कर दी गयी थी.
