सहरसा मुख्यालय: जिस देश में सौ शहरों को स्मार्ट सिटी में विकसित करने की परियोजना लायी जा रही हो, जहां बुलेट ट्रेन दौड़ाने की तैयारी की जा रही हो. उसी देश में रेल पटरियों पर महज 17 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से रेलगाड़ियां दौड़ रही हैं. यह दशा बिहार के सहरसा-राघोपुर रेलखंड की है.
दरअसल यह रेलखंड पहले सहरसा-फारबिसगंज हुआ करता था. 2008 में आयी कुसहा त्रसदी के बाद यह 113 किलोमीटर से सिमट कर 63वें कि मी पर राघोपुर तक आकर सिमट गयी है. ऐसा भी नहीं है कि इस रेलखंड के विकास की योजना नहीं बनी. 2003 के ही रेलबजट में सहरसा-फारबिसगंज रेलखंड के अमान परिवर्तन योजना को स्वीकृति मिली. लेकिन 15 वर्षो के दौरान न तो कभी पर्याप्त राशि ही दी गयी और न ही संसद में इस रेलखंड के लिए आवाज ही उठायी गयी. किश्तों में मिली राशि कब की समाप्त हो गयी और इधर समय के साथ अमान परिवर्तन के लिए स्टीमेटेड राशि भी लगातार बढ़ती चली गयी. इलाके के लोगों ने सांसद पप्पू यादव से ढ़ेर सारी अपेक्षाएं बना रखी है. आने वाला बजट ही बतायेगा कि पप्पू यादव ने अपने प्रभावों का कितना इस्तेमाल किया और क्षेत्र के विकास में कितनी भूमिका निभायी.
350 करोड़ रुपये का था पहला बजट
तत्कालीन सांसद दिनेश चंद्र यादव के प्रयास से साल 2003 के रेल बजट में शामिल सहरसा-फारबिसगंज एवं सकरी-निर्मली के अमान परिवर्तन के लिए 350 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली थी. लेकिन प्रथम चरण में अत्यल्प राशि मिलने के कारण काम की शुरुआत भर हो सकी. बाद के बजट में भी राशि नहीं मिलने या किश्तों में मिलने के कारण काम भी उसी अनुपात में मंथर गति से आगे बढ़ा. सिर्फ सहरसा-फारबिसगंज रेलखंड में एक सौ छोटे-बड़े पुल बनने थे. प्राप्त राशि से मात्र तीन बड़े व तीन दर्जन के करीब छोटे पुल तैयार हो सके हैं. समय के साथ अमान परिवर्तन का बजट बढ़ता गया. लेकिन बजट में इस रेलखंड को ब्रॉड गेज (बीजी) में परिवर्तित करने के लिए राशि की स्वीकृति नहीं मिल सकी.
बहुत सताती है राघोपुर तक की यात्र
अभी सहरसा-राघोपुर के बीच छह जोड़ी सवारी गाड़ी चलती है. इन सवारी गाड़ियों की रफ्तार 17 किलोमीटर प्रति घंटे की होती है. सहरसा जंक्शन से अंतिम गंतव्य राघोपुर तक 63 किलोमीटर की दूरी तय करने में इसे साढ़े तीन घंटे का समय लगता है. तय करने वालों के लिए यह यात्र बहुत उबाउ होती है. इस खंड के ट्रेनों का मेंटेनेंस भी नहीं होता है. लिहाजा पानी, शौचालय व बिजली की समस्या बनी रहती है. दुर्भाग्य से इस खंड के किसी भी स्टेशनों पर न तो खाने-पीने की कोई व्यवस्था है और न ही प्रसाधन की. एक बार फिर लोगों की उम्मीद भरी निगाहें 26 फरवरी को होने वाले रेल बजट की ओर टिक गई है. काश! अमान परिवर्तन के लिए पर्याप्त राशि मिल जाए.
अब 950 करोड़ की होगी जरूरत
2003 के बाद 2004 में सहरसा लोकसभा क्षेत्र से लोजपा की रंजीत रंजन सांसद चुनी गयी थी. उसके बाद हुए परिसीमन में यह क्षेत्र मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में शामिल हो गया. जहां से 2009 में शरद यादव जैसे कद्दावर राष्ट्रीय नेता चुनाव जीते. लेकिन दुर्भाग्य इन दोनों में से किसी ने इस अमान परिवर्तन की आवाज लोकसभा में नहीं उठायी. समय के साथ बजट बढ़ता गया और अब सहरसा-फारबिसगंज के इस रेलखंड को मीटर गेज (एमजी) से ब्रॉड गेज (बीजी) में बदलने के लिए 950 करोड़ रुपये की जरूरत होगी.राशि देने में सरकार जितना विलंब करेगी, बजट लंबा होता चला जायेगा.
लालू का आश्वासन भी काम न आया
नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र के लिए सहरसा-फारबिसगंज रेलखंड अत्यंत महत्वपूर्ण थी. 2008 के कुसहा त्रसदी में नदी की धारा ने पहले नरपतगंज के पास रेल पटरियों को बहाया तो ट्रेन का परिचालन ललितग्राम स्टेशन तक ही होने लगा. फिर बाढ़ का प्रभाव प्रतापगंज में हुआ तो रेल परिचालन को राघोपुर तक सिमटा दिया गया.
