सहरसा : लोकसभा चुनाव परिणाम में पार्टी के बैकफुट पर जाने की सारी जिम्मेवारियों को लेते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा इस्तीफ ा दिये जाने की घटना पर बुद्धिजीवियों ने अलग-अलग राय दी है. किसी ने इसे राज्य के लिए दुखद तो किसी ने हताशा में उठाया गया कदम बताया है. स्थानीय राजेंद्र मिश्र महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ रेणु सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का इस्तीफा देना राज्य के लिए दुखदायी है.
खासकर शिक्षा के क्षेत्र में इनके द्वारा उठाये गये कदम अविस्मरणीय और सूबे को प्रगति पथ पर बढ़ाने वाले रहे थे. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की सरकार में ही उच्च शिखा को सरकारी एजेंडे में शामिल किया गया. वहीं प्रेमलता अमरेंद्र मिश्र महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ दिलीप मिश्र ने कहा कि नीतीश जी का जाना तय था. बिना किसी ठोस कारणों के एनडीए से अलग होने के बाद ही इनकी उलटी गिनती शुरू हो गयी थी.
गृहिणी कविता केशरी कहती हैं कि वैसे नीतीश कुमार की सरकार में पिछले आठ वर्षो में सूबे में गुणात्मक परिवर्तन व व्यवस्था में आशातीत सुधार हुआ है.
लेकिन नीतीश भी राज्य की राजनीति से जातिवाद की बू को हटा नहीं सके थे. शिक्षक सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कि हार की जिम्मेवारी लेकर तुरंत इस्तीफा देकर नीतीश ने मर्यादा का प्रदर्शन किया है. समाजसेवी दिवाकर सिंह ने सीएम के इस कदम को हताशा में उठाया गया कदम बताया है. उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता की मिसाल रहे नीतीश ने राज्य में विकास का परचम लहराया है. बिहारी अस्मिता को पहचान दिलायी है. डॉ एलएन झा ने कहा कि यह नीतीश कुमार का बड़प्पन है कि पार्टी की हार की जिम्मेवारी लेते उन्होंने पद त्याग कर दिया. जनता की नजर में वे और भी महान नेता के रूप में स्थापित हो गये हैं. वहीं डॉ विभाष कुमार कहते हैं कि नीतीश कुमार ने राज्य में दिखने वाला और नहीं दिखने वाला दोनों विकास किया है. राज्य की विधि-व्यवस्था से लेकर हर विभाग को चुस्त-दुरुस्त बनाने में उनका योगदान रहा है. इस्तीफा देने की घटना दुखदायी है.
