कलाभवन में गूंजा टैगोर की 'चंडालिका' का संदेश, स्थानीय कलाकारों ने हिंदी रूपांतरण से मोहा दर्शकों का मन

पूर्णिया स्थित कलाभवन में 'नृत्यालय नृत्य अकादमी' ने रवींद्रनाथ टैगोर की कालजयी कृति 'चंडालिका' का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत किया. यह मंचन जाति-भेद के विरुद्ध मानवता का सशक्त संदेश लेकर आया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

पूर्णिया स्थित कलाभवन में रविवार देर शाम डॉ. लक्ष्मी नारायण सुधांशु स्मृति ‘कलाकारों का मंच’ के मासिक कार्यक्रम के तहत एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया. नाट्य विभाग के तत्वावधान में 'नृत्यालय नृत्य अकादमी' पूर्णिया के कलाकारों ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी और अमर कृति ‘चंडालिका’ का हिंदी रूपांतरण में अत्यंत प्रभावशाली मंचन किया. भावपूर्ण नृत्य, सशक्त अभिनय, उत्कृष्ट संगीत संयोजन और मंच-सज्जा ने उपस्थित दर्शकों को अंत तक बांधे रखा.

इन दिग्गजों के मार्गदर्शन में सफल हुआ मंचन

सांस्कृतिक संध्या का आयोजन एवं निर्देशन कुशल कलाकारों की देखरेख में संपन्न हुआ:

  • संयोजक व नाट्य निर्देशक: कार्यक्रम के संयोजक विश्वजीत सिंह और नाट्य निर्देशक कुंदन कुमार थे.
  • निर्देशन व नृत्य-परिचालन: इस नृत्य-नाटिका का मुख्य निर्देशन त्रिदीप शील ने किया, जबकि नृत्य-परिचालन की कमान त्रिदीप शील, पूजा प्रामाणिक और श्रेया साधु खान ने संयुक्त रूप से संभाली.
  • प्रकाश संचालन: मुंबई के फिल्म कलाकार अमित झा ने बेहतर प्रकाश-संयोजन (Lighting) से मंच को जीवंत बनाया.

1933 में रचित बांग्ला कृति का हिंदी अवतार

विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मूलतः बांग्ला भाषा में इस नृत्य-नाटिका की रचना की थी:

  • ऐतिहासिक संदर्भ: इसका प्रथम प्रकाशन वर्ष 1933 में हुआ था तथा 1938 में इसे पूर्ण नृत्य-नाटिका का रूप दिया गया.
  • महान संगीतकारों की आवाज: नृत्यालय नृत्य अकादमी ने इसे व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने के लिए हिंदी में प्रस्तुत किया. इस हिंदी संस्करण को श्याम दास गुप्ता, कविता कृष्णमूर्ति, पंकज उधास, हरिहरन, अनुप जलोटा, अनुपमा देशपांडे जैसे सुप्रसिद्ध गायकों के पार्श्वगायन (Playback Singing) ने और अधिक प्रभावशाली बना दिया.

जाति-भेद पर प्रहार और मानवता का सशक्त संदेश

बौद्ध परंपरा और जातक कथा से प्रेरित यह नाटक समाज में व्याप्त अस्पृश्यता और जातिगत विषमता पर करारा प्रहार करता है:

  • मुख्य कथानक: चंडाल जाति की युवती 'प्रकृति' समाज के दुर्व्यवहार से स्वयं को हीन समझती है. एक दिन बौद्ध भिक्षु आनंद उससे पीने के लिए जल मांगते हैं और कहते हैं— "मैं केवल एक मनुष्य से जल मांग रहा हूं, तृष्णा बुझाने वाले जल की कोई जाति या धर्म नहीं होता."
  • आत्मबोध और करुणा: भिक्षु आनंद के इस संवाद से प्रकृति के भीतर मानव होने का गौरव और आत्मसम्मान जागृत होता है. आगे चलकर मोह, तांत्रिक विद्या, पश्चाताप और त्याग के चरणों से गुजरती यह नाटिका यह संदेश देती है कि मनुष्य की पहचान जन्म या जाति से नहीं, बल्कि उसके मानवीय गुणों और करुणा से होती है.

इन कलाकारों ने अपने अभिनय से जमाई धाक

रंगमंच पर स्थानीय कलाकारों के जीवंत अभिनय की जमकर सराहना हुई:

पात्र / भूमिकाकलाकार का नाम
प्रकृति (चंडालिका)श्रेया साधु खान
माया (प्रकृति की मां)पूजा प्रामाणिक
बौद्ध भिक्षु आनंदसूरज साहनी
दही वालाशुभम कुमार
चूड़ी वाला व कोटालअजय कुमार मंडल
ग्रामवासी एवं डाकिनीभाव्या शाहदादपूरी, श्रेयाश्री, गीतों कुमारी, कशिश सिंह, शाम्भवी सौम्या
संन्यासीगणसंचारी सोम, ज्ञानती, यशी, आयुषी दास

प्रस्तुति के समापन पर पूरा कलाभवन सभागार देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा.


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लेखक के बारे में

By अरुण कुमार

अरुण कुमार प्रिंट माध्यम में 32 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक हिन्दुस्तान से की. अभी प्रभात खबर के पूर्णिया कार्यालय में कार्यरत हैं. सामाजिक सरोकार, अपराध, शिक्षा, राजनीतिक खबरों में रुचि रखते हैं.

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