पूर्णिया शहर के गुलाबबाग स्थित पुराना सिनेमा रोड में आदिशक्ति मां दुर्गा का एक बेहद प्राचीन और सिद्ध मंदिर स्थित है, जहां पिछले लगभग छह दशकों (60 वर्षों) से लगातार धार्मिक अनुष्ठान हो रहा है. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां आरंभ से ही बंगला पद्धति से पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है. गुलाबबाग ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्णिया शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई है.
मन्नत पूरी होने की अटूट आस्था, पूजा के बाद ही भोजन करते हैं लोग
स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस मंदिर में सच्चे मन से जो भी मनोकामना मांगी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है:
- आस्था और परंपरा: मंदिर से जुड़े कई परिवारों में परंपरा है कि सुबह-शाम होने वाली आरती और पूजन के बाद ही घर के लोग भोजन ग्रहण करते हैं.
- ग्रामीणों का भारी जुटान: भले ही यह मंदिर शहरी क्षेत्र (गुलाबबाग) में स्थित है, लेकिन यहां आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में महिला और पुरुष श्रद्धालु चढ़ाना चढ़ाने और मनौती मांगने आते हैं.
बंगला संस्कृति की अमिट छाप
गुलाबबाग के इस मंदिर की पूजन शैली क्षेत्र के अन्य मंदिरों से काफी अलग है:
- बंगला पद्धति से पूजन: शुरुआत से ही इस मंदिर में बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं.
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: शुरुआती दौर में इस इलाके में बंगाली समाज के लोगों की अच्छी-खासी आबादी थी, जिसके कारण पूजन प्रक्रिया में बंगला संस्कृति की स्पष्ट झलक आज भी देखने को मिलती है.
1966 से शुरू हुआ इतिहास, 2006 में लगी संगमरमर की प्रतिमा
मंदिर के इतिहास के बारे में स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं:
- स्थापना का इतिहास (1966): वर्ष 1966 में स्थानीय नागरिकों के मन में दुर्गा पूजा आयोजित करने का विचार आया. इसके बाद पालो दास, सुनील दास, आशुतोष दास, नारायण कुंडू सहित अन्य प्रमुख लोगों ने एक समिति बनाई और अनुष्ठान की शुरुआत की.
- प्रतिमा निर्माण और भव्य रूप: शुरुआती दिनों में बंगाल से आने वाले मूर्तिकार हर साल मिट्टी की प्रतिमा बनाते थे. वर्ष 2006 में मंदिर में मां दुर्गा की भव्य संगमरमर की प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई और मंदिर को आधुनिक व भव्य स्वरूप दिया गया.
