आदिवासियों, दलितों व महादलितों को भूमि दिलाने के लिए पटना में 18 फरवरी को होगी रैली : राज गोपाल

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 28 Jan 2015 6:38 AM

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पटना: जल, जंगल और जमीन भगवान ने दिया है, न कि सरकार ने. इसलिए इसका अधिकार जनता को मिले. भूमिहीनों को जमीन न मिले, इसके लिए बिहार में दादागिरी हो रही है. गरीबों को जमीन देने के बजाय सरकार ने कॉरपोरेट घरानों को दिलाने के लिए आसमान सिर पर उठा रखा है. सरकार के इस […]

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पटना: जल, जंगल और जमीन भगवान ने दिया है, न कि सरकार ने. इसलिए इसका अधिकार जनता को मिले. भूमिहीनों को जमीन न मिले, इसके लिए बिहार में दादागिरी हो रही है. गरीबों को जमीन देने के बजाय सरकार ने कॉरपोरेट घरानों को दिलाने के लिए आसमान सिर पर उठा रखा है. सरकार के इस रैवैये के खिलाफ एकता परिषद पटना में 18 फरवरी को महारैली निकालेगी. ये बातें एकता परिषद के संस्थापक अध्यक्ष पीवी राज गोपाल ने कहीं.

वह तीन दिवसीय दौरे पर बिहार आये हुए हैं. राज गोपाल पटना, जहानाबाद और गया में भूमिहीनों से बात करेंगे और उनकी समस्याओं से रू-ब-रू होंगे. वे भूमिहीन दलितों, महादलितों और गरीबों को भूमि दिलाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से भी बात करेंगे. सीएम से भूमि समस्या के निदान के लिए टास्क फोर्स बनाने को कहेंगे. आपदा में जमीन खो चुके लोगों व भूमिहीनों को आवासीय जमीन दिलाने की मांग करेंगे.

गरीबों को होगा नुकसान : उन्होंने बताया कि बिहार में भूमि सुधार के मोरचे पर 1992 से एकता परिषद लगातार काम कर रही है. 22 जिलों में परिषद का संगठन सक्रिय है. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश काल के बने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कर 2011 में नया भूमि अधिग्रहण कानून सरकार ने बनाया. उक्त कानून का प्रस्ताव तैयार करने में मेरी भी भूमिका थी. उस कानून को मोदी सरकार ने बदल दिया. इस कानून से गरीबों का भारी नुकसान होगा. 2011 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में जमीन मालिक और मजदूरों को भी मुआवजा देने का प्रावधान था.

अधिगृहीत जमीन का छह माह तक इस्तेमाल न होने पर किसानों को उसे वापस करने का भी प्रावधान था. मोदी सरकार ने एक झटके में किसान-मजदूरों के अधिकारों से वंचित कर दिया. एकता परिषद इस कानून के विरोध में 20 से 23 फरवरी तक दिल्ली में मार्च करेगा. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार कॉरपोरेट कल्चर की गिरफ्त में है. विश्व बैंक ने मानक तय किये हैं कि जो देश उद्योगपतियों को जमीन देने का कानून बनायेगा, उसे वह अच्छे कैटेगरी में डालेगा. विश्व बैंक की कैटेगरी में भारत 147वें पायदान पर है और 40 से 50वें स्थान पर आना चाहता है.

केंद्र सरकार की इस कोशिश से पर्यावरण सुरक्षा और श्रम कानून तहस-नहस हो जायेगा. देश में निवेश को प्राथमिकता देने के नाम पर सरकार मानवाधिकार हनन करने में जुटी है. सच कहा जाये, तो यह देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. बिहार के बारे में उन्होंने कहा कि यहां इमरजेंसी जैसे हालात बन गये हैं. इस हालात से सूबे को बाहर निकालने के लिए सभी जन संगठनों को एक मंच पर आना होगा. आज भी देश में 20 प्रतिशत दलित, आठ प्रतिशत आदिवासी, 11 प्रतिशत घुमंतू और दो प्रतिशत मछुआरे भूमिहीन हैं. जो आदिवासी भूस्वामी थे, उन्हें खदेड़ा जा रहा है. आदिवासियों को भूमि मुहैया कराने के मामले में पिछड़े राज्यों में बिहार दूसरे व तमिलनाडु पहले नंबर पर है. आज भी देश के लाखों लोग सड़क, फुटपाथ और रेल पटरियों के किनारे रह रहे हैं. बिहार में भूदान में मिली 20 लाख एकड़ जमीन पर भी शत-प्रतिशत कब्जा सरकार नहीं दिला पायी.

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