डॉ मयंक मुरारी
चिंतक और आध्यात्मिक लेखक
मानव सभ्यता के पहले देव का नाम सूर्य है, जिनकी पूजा का अनुष्ठान जल से जुड़ा है. सूर्य की उपासना की पांच हजार से पूर्व की परंपरा है. भारतीय चिंतन कहता है कि पांच तत्वों से यह संसार बना है, उन्हीं से मनुष्य बना है.
इस प्रकार मनुष्य प्रकृति का अंग है, उससे पृथक नहीं है. मनुष्य की आंखों में प्रकाश है और मृत्यु के बाद वह प्रकाश सूर्य के प्रकाश में मिल जायेगा. सूर्य में प्रकाश और ऊष्मा दोनों है. सूर्य के साथ जल और वायु परस्पर संबंध है. सूर्य का प्रतिदिन उदय होता है, पवित्र करनेवाले जल और चारों ओर घूमने वाले वायु उसकी नियमों के अंतर्गत है.
जीवन का अर्थ ही है, सूर्य को देखना (ऋग्वेद के छठें मंडल के 52सूक्त का पांचवां ष्लोक). सूर्य ही एकमात्र ऐसा देव है, जो स्वयं दिखता है और जिसका प्रभाव हम सदैव अनुभूत करते हैं. भारतीय वांड़्मय में कहा गया है कि सभी अमर देव सूर्य पर अधिष्ठित है (अमृता अधि तस्थु:) . ऐसा कहने के पीछे तात्पर्य है कि प्रकृति की समस्त शक्तियों के केंद्र में सूर्य है. वह अपनी शक्तियों से दिनों को नापता है. इस प्रकार समय का बोध भी सूर्य की गति से निर्धारित होता है.
सभ्यता के आदिकाल में यह सूर्य मनुष्य के लिए आशा का संदेश देता था. दिन में भय नहीं था और रात में अंधेरा होता तो मनुष्य अग्नि के सहारे जीवन की रक्षा करता था. यह अग्नि भी सूर्य की प्रकार है. ऋग्वेद के एक मंडल के ऋषि वशिष्ठ कहते है कि हम उगते सूर्य को देखें. यह हमारे लिए कल्याणकारी है. भारत में सूर्य को मित्र कहा गया.
जीवन में प्रकाश और उल्लास का संचार हो, इसके लिए ऋषियों ने जगत की प्रेरक शक्ति को अर्घ्य देने का विधान बनाया. सूर्य के रूप में ही उसका प्रकाश जीवन को खोल रहा है. अतएव सभी जीवित प्राणियों से आशा की गयी कि वह उसके सम्मान में खड़ा हो.
