बंदरा से सूर्यमणि कुमार की रिपोर्ट
Muzaffarpur News: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पूर्व कुलपति और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का मंगलवार सुबह करीब छह बजे उनके पैतृक आवास मतलुपुर में निधन हो गया. वे 96 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. उनके निधन से कृषि जगत और क्षेत्रीय समाज में शोक की लहर दौड़ गई है.
मिट्टी से जुड़ाव और ‘बाबा’ का संकल्प
15 फरवरी 1930 को जन्मे डॉ. त्रिवेदी 1982 में कुलपति पद से सेवानिवृत्त हुए थे. पद की गरिमा और उच्च ओहदों के बावजूद उनका अपनी मिट्टी से जुड़ाव कभी नहीं टूटा. गांव लौटकर उन्होंने ‘बिहार एक्वा कल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर’ (बाबा) नामक संस्था बनाई. इसके जरिए वे ग्रामीणों को मछली पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन और आधुनिक खेती की तकनीकों का मार्गदर्शन देते रहे. उनके परिवार में बेटा डॉ. रमन कुमार त्रिवेदी, जो पूसा विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं, और दो बेटियां हैं.
संघर्ष से कुलपति तक का सफर
डॉ. त्रिवेदी का जीवन किसी प्रेरणा से कम नहीं था. पिता के निधन के बाद उन्होंने एक समय पढ़ाई छोड़कर हल थाम लिया था. लेकिन मां की प्रेरणा और अपनी मेधा के बल पर उन्होंने पीएचडी पूरी की और उसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने जहां कभी छात्र थे. उनकी प्रतिभा को स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी ने पहचाना था. उनके कहने पर एक पोस्टकार्ड पर लिखे आवेदन ने उनकी किस्मत बदल दी और वे कृषि विज्ञान की दुनिया के बड़े नाम बने.
बिहार में ‘शीतकालीन मक्का’ के जनक
बिहार में शीतकालीन मक्का (Winter Maize) की खेती को बढ़ावा देने का श्रेय डॉ. त्रिवेदी को ही जाता है. उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मार्गदर्शन के कारण ही आज बिहार मक्का उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में खड़ा है. उन्होंने केवल फसल नहीं बदली, बल्कि किसानों की सोच और तकनीक के प्रति नजरिया भी बदल दिया.
जेपी के विश्वासपात्र और आस्था के उपासक
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने मुशहरी क्षेत्र के किसानों की बदहाली दूर करने की जिम्मेदारी डॉ. त्रिवेदी को ही सौंपी थी. जेपी मानते थे कि सामाजिक बदलाव का रास्ता खेतों से निकलता है. इसके साथ ही वे गहरे आध्यात्मिक व्यक्ति थे. हर महीने गांव के शिव मंदिर में रुद्राभिषेक कराना और अपने ही बागान के बेलपत्र चढ़ाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. कर्म और आस्था के इसी संतुलन ने उन्हें जन-जन का प्रिय बनाया.
