Muzaffarpur Emotional Farewell: "पापा... मां... एक बार आंखें खोल लो... देखो न हम लोग आ गए हैं, अपने बेटा-बहू से एक बार तो गले मिल लो." यह कहकर बेंगलुरु से पहुंचा निखिल दहाड़ मारकर रोने लगा. निखिल अपनी पत्नी के साथ जैसे ही घर पहुंचा, माता-पिता के शव देखकर सुध-बुध खो बैठा. बहन पंखुड़ी ने भाई को संभालने की कोशिश की, लेकिन खुद भी उसके गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी. भाई-बहन के इस कारुणिक चीत्कार को देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं.
चार कांधों पर उठीं दो अर्थियां, छलक पड़े पूरे मोहल्ले के आंसू
माता-पिता के शवों को कंधा देने के लिए बेटा निखिल, बेटी पंखुड़ी, दामाद और भतीजा एक साथ आगे आए. चारों ने मिलकर जब दोनों अर्थियों को उठाया, तो पड़ोसियों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. कल तक जो अशोक कुंवर हर किसी को हंसकर 'राम-राम' कहते थे, वे आज अपनी जीवनसंगिनी नीलम कुंवर के साथ हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो रहे थे.
सिकंदरपुर मुक्तिधाम में एक साथ जलीं दो चिताएं, धुएं में खो गई ममता और दुलार
सिकंदरपुर मुक्तिधाम में जैसे ही चिताओं को आग दी गई और लपटें उठीं, निखिल घुटनों के बल बैठकर रोने लगा. कांपते हाथों से बेटे ने अपने माता-पिता को मुखाग्नि दी. पिता का दुलार और मां का आंचल एक ही पल में राख के ढेर में बदल गया. मुक्तिधाम से उठता धुआं परिजनों और पूरे मोहल्ले के दिल पर कभी न भरने वाला जख्म छोड़ गया.
41 साल का सफरनामा: राम-सीता को मंदिर में बिठाने वाली जोड़ी एक साथ हुई विदा
रिटायर्ड बैंक अधिकारी अशोक कुंवर धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे. उन्होंने अपने घर के पास हनुमदीश्वर महादेव मंदिर में 1 अप्रैल 2012 को राम, सीता और लक्ष्मण की प्रतिमा स्थापित कराई थी. पोस्टमार्टम के बाद जब दोनों के शव पहुंचे, तो बुजुर्ग महिलाओं ने बिलखते हुए कहा कि राम-सीता की स्थापना करने वाले पति-पत्नी शादी के 41 साल बाद भी एक साथ ही इस दुनिया से रुखसत हो गए.
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