तारापुर का उल्टा स्थान महादेव मंदिर, जहां पश्चिममुखी शिवलिंग और पौराणिक रहस्य श्रद्धालुओं को करता है आकर्षित

तारापुर का उल्टा स्थान महादेव मंदिर अपनी पश्चिम दिशा की ओर गर्भगृह के द्वार के लिए प्रसिद्ध है, जो सामान्य मान्यताओं के विपरीत है. पुत्र-वियोग की एक मार्मिक लोककथा से जुड़ा यह मंदिर पाल काल से भी पुराना माना जाता है.

तारापुर एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक आस्था का केंद्र उल्टा स्थान महादेव मंदिर अपनी अनूठी स्थापत्य कला और पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. सावन का महीना हो या महाशिवरात्रि का पावन अवसर, भागलपुर, बांका और मुंगेर सहित आसपास के जिलों से हजारों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. मंदिर में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग इस क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक विशेषताओं में से एक माना जाता है. इसके अलावा लग्न के दिनों में यहां विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए भी श्रद्धालुओं की खासी भीड़ बनी रहती है.

पश्चिम दिशा की ओर है गर्भगृह का द्वार

सामान्यतः सनातन परंपरा के अनुसार अधिकांश शिव मंदिरों के गर्भगृह का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर होता है, लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके गर्भगृह का मुख्य द्वार पूर्व की जगह पश्चिम दिशा की ओर है. वास्तु और सामान्य स्थापत्य की दिशा से विपरीत होने के कारण ही इस धाम को “उल्टा स्थान महादेव” के नाम से पुकारा जाता है.

पुत्र-वियोग की मार्मिक लोककथा से जुड़ी मान्यता

स्थानीय धार्मिक लोक मान्यताओं के अनुसार, एक निःसंतान दंपति ने बाबा बैद्यनाथ की कठिन आराधना के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति की थी. पुत्र के जन्म की मन्नत पूरी होने पर वे सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल लेकर पैदल देवघर जा रहे थे. जब वे तारापुर पहुंचे, तो दुर्भाग्यवश उनके बालक को एक विषधर सांप ने डंस लिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई.

पुत्र के वियोग में व्यथित माता-पिता ने उसी स्थान पर भगवान शिव का मंदिर बनवाने का संकल्प लिया. कहा जाता है कि उन्होंने मंदिर के द्वार की दिशा सामान्य परंपरा के विपरीत पश्चिम की ओर रखी. कालक्रम में यही स्थल “उल्टा स्थान महादेव” के नाम से प्रख्यात हुआ.

पाल काल से भी जोड़ा जाता है इतिहास

स्थानीय जनश्रुतियों और दावों के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना लगभग 750 ईस्वी के आसपास पाल वंश के शासनकाल में हुई मानी जाती है. हालांकि, पुरातात्त्विक विशेषज्ञों का मानना है कि इस दावे की पुष्टि के लिए अभी तक कोई प्राथमिक पुरातात्त्विक अवशेष या शिलालेखीय प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं. इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय एक प्राचीन एवं समृद्ध धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है.

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लेखक के बारे में

By संजय वर्मा

संजय वर्मा प्रिंट माध्यम में 15 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. तारापुर (भागलपुर) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.

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