तारापुर (मुंगेर) से संजय वर्मा की रिपोर्ट
Aaj Ka Darshan: बिहार के मुंगेर जिले के तारापुर अनुमंडल अंतर्गत धौनी गांव में स्थित कृष्ण काली भगवती मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, तंत्र साधना और लोकविश्वास का जीवंत केंद्र है. वर्ष 1560 ईस्वी में स्थापित यह मंदिर आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. यही वजह है कि पूरे वर्ष भक्तों का तांता लगा रहता है.
ऋग्वेद काल की नदी किनारे बसा है यह प्राचीन धाम
तारापुर क्षेत्र का यह मंदिर मोहनगंज दुर्गा मंदिर के बाद दूसरा सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है. यह धौनी गांव में चौरा नदी के किनारे स्थित है, जो बदुआ नदी की उपशाखा है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बदुआ नदी का उल्लेख ऋग्वेद में “बंडुरानी नदी” के रूप में मिलता है. मंदिर का इतिहास तंत्र साधना और शाक्त परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है.
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तांत्रिक पद्धति से हुई थी स्थापना
मंदिर की स्थापना आचार्य बाबा महेश्वर ने पूर्ण तांत्रिक विधि से कराई थी. स्थापना काल से ही पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर से आए दत्ता परिवार द्वारा यहां बंगला पद्धति से पूजा-अर्चना की जाती रही है. कई पीढ़ियों से यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है.
Aaj Ka Darshan: बिना मूर्ति के होती है माता की पूजा
कृष्ण काली भगवती मंदिर की सबसे अनोखी पहचान यह है कि यहां माता की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है. श्रद्धालु केवल वेदी की पूजा करते हैं और उसी में मां की शक्ति का दर्शन करते हैं. मंदिर में मां काली, मां भगवती, भगवान कृष्ण और भगवान विष्णु की संयुक्त आराधना की जाती है. इसी कारण इसका नाम कृष्ण काली भगवती मंदिर पड़ा.
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पहली कलश स्थापना यहीं से शुरू होती है
नवरात्र के दौरान क्षेत्र की एक विशेष परंपरा इस मंदिर से जुड़ी है. मान्यता है कि यहां प्रथम कलश स्थापना होने के बाद ही आसपास के अन्य मंदिरों में कलश स्थापित किए जाते हैं. इससे मंदिर की धार्मिक महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है.
Aaj Ka Darshan: कन्या पूजन से जुड़ी है गहरी आस्था
शारदीय नवरात्र में यहां कुंवारी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है. श्रद्धालु उनके चरण स्पर्श करते हैं और मंदिर परिसर में भोजन कराते हैं. स्थानीय विश्वास है कि इस पूजा में शामिल होने वाले भक्तों की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं. प्रत्येक शनिवार रात यहां भजन, संकीर्तन और विशेष पूजा का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं.
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